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Sunday, 10 May 2026

अंदर का शोर

 अंदर का शोर


मेरे अंदर बहुत आवाज़ें रहती हैं,

मगर अजीब बात है

अब कोई सुनाई नहीं देता।


पहले

मैं हर रिश्ते को

दिल की मिट्टी में बोता था,

और छोटी-सी मोहब्बत भी

मेरे भीतर

पेड़ बनकर उग आती थी।


अब…

बहुत कुछ सूख चुका है।


मैं लोगों से मिलता हूँ,

हँसता भी हूँ,

बातें भी करता हूँ

मगर हर बातचीत के पीछे

एक बंद कमरा है,

जहाँ मैं आज भी

चुप बैठा हूँ।


कभी-कभी लगता है

मैंने अपने ही हाथों

अपने अंदर का मौसम मार दिया।


अब बारिश होती भी है

तो आँखें नहीं भीगतीं,

सिर्फ़ यादें नम हो जाती हैं।


तुम्हें पता है?

सबसे ख़तरनाक तन्हाई वो नहीं

जिसमें कोई साथ न हो

बल्कि वो है

जिसमें आदमी

ख़ुद से मिलना छोड़ दे।


मैंने कई बार

अपने भीतर लौटने की कोशिश की,

मगर हर बार

कोई टूटा हुआ अहसास

दरवाज़े पर मिल गया।


और मैं वापस लौट आया।


अब मेरे अंदर

धीरे-धीरे

एक ख़ामोश जंगल उग रहा है

जहाँ

न कोई पत्ता हिलता है,

न कोई परिंदा बोलता है।


सिर्फ़

यादों की सूखी टहनियाँ हैं,

और उन पर बैठी

कुछ अधूरी बातें।


लोग आज भी कहते हैं

“तुम पहले जैसे नहीं रहे।”


उन्हें कौन समझाए

कि कुछ हादसे

आदमी को बदलते नहीं,

धीरे-धीरे

उसे उसके अंदर से ख़त्म कर देते हैं।


मुकेश ,,,,,,,

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