दो जिस्मों के बीच हवा के हस्ताक्षर
दो जिस्मों के बीच
एक पतली-सी दूरी थी
इतनी कि छुआ भी जा सके,
और बचा भी जा सके।
उसी दरार में
हवा ठहरी नहीं,
बस गुज़री
और अपने अदृश्य हस्ताक्षर
छोड़ती चली गई।
न वह स्पर्श थी,
न पूरी जुदाई
बस एक कंपन,
जो त्वचा से पहले
मन को छू जाता है।
उसने समय की स्लेट पर
कोई स्पष्ट शब्द नहीं लिखे,
बस एक हल्की-सी रेखा—
जो पास होने और
दूर रहने के बीच
खींची रहती है।
मैंने उसे पकड़ना चाहा,
तो वह फिसल गई
जैसे रिश्तों में
सबसे सच्ची चीज़
कभी थामी नहीं जाती।
ये हस्ताक्षर
कहते हैं
नज़दीकी का अर्थ
हमेशा स्पर्श नहीं होता।
कभी-कभी
दो जिस्मों के बीच की हवा ही
सबसे सच्चा संवाद होती है
जहाँ बिना छुए भी
सब कुछ कहा जा चुका होता है।
मुकेश ,,,,,,,
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