धूप से गुफ़्तगू — और बंद पड़ी घड़ी
घर में एक घड़ी थी
जो कई बरसों से बंद पड़ी थी।
उसकी सुइयाँ
तीन बजकर सत्रह मिनट पर अटकी थीं,
जैसे वक़्त ने
वहीं आकर साँस लेना छोड़ दिया हो।
मैं अक्सर उसे देखता था,
मगर उस दिन
धूप सीधे उसी पर जाकर ठहरी।
उसने काँच पर
अपनी उँगलियाँ फेरीं,
और घड़ी के भीतर
जमी धूल अचानक चमक उठी।
मैंने पूछा —
“तुम रोज़ इसे छूती हो,
फिर भी यह चलती क्यों नहीं?”
धूप ने
धीरे से मुस्कुराकर कहा —
“हर चीज़ का चलना ज़रूरी नहीं होता।
कुछ चीज़ें
रुककर ज़्यादा सच हो जाती हैं।”
मैं चुप रहा।
कमरे में
पुराने काग़ज़ों और दवाइयों की मिली-जुली गंध थी।
खिड़की से आती हवा
परदों को ऐसे हिला रही थी
जैसे कोई अदृश्य आदमी
कमरे में टहल रहा हो।
मैंने घड़ी को देखा।
उसकी बंद सुइयों में
एक अजीब-सी ज़िद थी।
धूप बोली
“तुम इंसान
वक़्त को बहुत ग़लत समझते हो।
तुम्हें लगता है
वह सिर्फ़ आगे बढ़ता है।
जबकि सच यह है
कि कुछ लम्हे
हमारे भीतर हमेशा के लिए रुक जाते हैं।”
फिर उसने
दीवार पर मेरी परछाईं की तरफ़ इशारा किया।
“देखो,”
वह बोली,
“तुम अभी भी
कई साल पहले वाले अपने आप को
अपने भीतर लिए घूम रहे हो।
वही डर,
वही अधूरी बातें,
वही किसी के जाने की आवाज़।”
मुझे लगा
कमरा अचानक थोड़ा छोटा हो गया है।
जैसे दीवारें
धीरे-धीरे भीतर की तरफ़ खिसक रही हों।
मैंने पूछा —
“तो क्या आदमी कभी बदलता नहीं?”
धूप कुछ देर
बंद घड़ी के काँच में चमकती रही।
फिर बहुत धीमे से बोली
“बदलता है।
मगर पेड़ की तरह नहीं…
सुगंध की तरह।
दिखाई नहीं देता,
बस एक दिन
पूरा कमरा अलग लगने लगता है।”
मुकेश ,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment