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Tuesday, 12 May 2026

रेगिस्तान में कोई पदचिह्न स्थायी नहीं होता

 रेगिस्तान में कोई पदचिह्न स्थायी नहीं होता

रेगिस्तान का एक विस्तार है,
अनंत,
सुनहरा,
जहाँ हवा
हर चीज़ का इतिहास मिटाती चलती है।

मैं वहाँ अकेला था,
अपने ही क़दमों के साथ।

चलते हुए
मैं बार-बार पीछे देखता,
यह जानने के लिए
कि मैंने कितना सफ़र तय किया है।

मगर हर बार
रेत समतल मिलती—
जैसे मेरे गुज़रने का
कोई प्रमाण ही न बचा हो।

पहले मुझे दुःख हुआ।

इंसान चाहता है
कि उसकी यात्रा का कोई निशान रहे,
कोई स्मृति,
कोई नाम,
कोई ऐसी रेखा
जो समय से बच जाए।

पर उस रेगिस्तान में
हवा बार-बार
मुझे एक ही बात सिखा रही थी—

“स्थायित्व
सिर्फ़ भ्रम है।”

मैंने चलना जारी रखा।

धीरे-धीरे
मुझे अपने मिटते हुए निशानों से
डर लगना बंद हो गया।

क्योंकि
शायद जीवन का अर्थ
अमर हो जाना नहीं,
बल्कि पूरे मन से गुज़र जाना है।

शाम तक
आकाश तांबे जैसा हो गया था,
और दूर कहीं
एक अकेला पेड़ दिखाई दिया।

मैं उसके पास बैठा
तो लगा—
इस विशाल, मिटती हुई दुनिया में भी
क्षण भर की छाया
किसी वरदान से कम नहीं होती।

मुकेश',,,,,,,

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