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Wednesday, 20 May 2026

भीड़ के बिना भीड़ में खड़ा आदमी

 भीड़ के बिना भीड़ में खड़ा आदमी

शहर में हर जगह भीड़ थी, लेकिन भीड़ अब भीड़ जैसी नहीं लगती थी। वह सिर्फ़ गति का एक फैलाव थी — बिना चेहरे, बिना ठहराव।

इसी फैलाव के बीच वह आदमी खड़ा रहता था।

वह भागता नहीं था, लेकिन रुकता भी नहीं था। उसका खड़ा होना किसी निर्णय जैसा नहीं था, बल्कि एक स्थिति जैसा था — जैसे किसी ने चलने और न चलने के बीच की जगह चुन ली हो।

लोग उसके पास से गुजरते थे। उनके शब्द भी गुजरते थे, उनकी जल्दी भी। पर उसके आसपास एक बहुत पतली-सी परत बनी रहती थी, जहाँ सब कुछ थोड़ा धीमा हो जाता था, जैसे समय वहाँ सांस लेने के लिए रुक गया हो।

कभी-कभी कोई उसे देखता और उसे अकेला समझ लेता। पर वह अकेला नहीं था। वह उस भीड़ का हिस्सा था जो दिखाई नहीं देती थी — भीतर की भीड़।

उसके भीतर विचार चलते थे, लेकिन वे भीड़ की तरह नहीं थे। वे दूर-दूर खड़े थे, एक-दूसरे को छूते नहीं थे, बस मौजूद रहते थे।

एक दिन उसने महसूस किया कि वह जहाँ खड़ा है, वह जगह बदल रही है। पहले लोग उसके पास से गुजरते थे, अब जैसे वह उनके गुजरने के बीच खड़ा है।

उसने सोचा — शायद भीड़ बाहर नहीं है, वह भीतर है, और वह उसी के बीच स्थिर खड़ा है।

और उसी क्षण उसे यह भी समझ नहीं आया कि वह खड़ा है या चल रहा है।

क्योंकि अब गति और ठहराव के बीच कोई साफ़ रेखा नहीं बची थी।

मुकेश ,,,,,,,,,

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