कभी सोचा है
हम सचमुच किसी जगह रहते भी हैं,
या बस
अपनी आदतों के भीतर बस जाते हैं।
एक ही कप में चाय पीना,
उसी खिड़की से शाम देखना,
उसी रास्ते से लौटना
धीरे-धीरे ये सब
हमारी आत्मा के फर्नीचर बन जाते हैं।
फिर एक दिन
कोई चीज़ बदलती है।
मेज़ अपनी जगह से हटती है,
कोई पुराना पेड़ कट जाता है,
या किसी की आवाज़
हमेशा के लिए बंद हो जाती है।
और तब पता चलता है
कि मनुष्य
ईंट और पत्थर में नहीं रहता,
वह छोटी-छोटी दोहराई गई चीज़ों में रहता है।
शायद इसी लिए
वियोग इतना गहरा होता है।
हम किसी इंसान को नहीं खोते,
हम उसके साथ जुड़ी हुई
अपनी एक आदत खो देते हैं।
समय भी अजीब कारीगर है।
वह चेहरे नहीं मिटाता,
बस उनके अर्थ बदल देता है।
जो हाथ कभी
सारी दुनिया लगते थे,
वे बरसों बाद
सिर्फ़ एक दृश्य रह जाते हैं
जैसे स्टेशन से गुज़रती ट्रेन की खिड़की में
क्षण-भर दिखा कोई यात्री।
और जीवन?
शायद वह कोई यात्रा भी नहीं।
यात्रा में तो
कम-से-कम कहीं पहुँचने का भ्रम होता है।
जीवन शायद
एक कमरे में रखे जलते दीपक जैसा है
जो पूरी रात
अपने ही चारों ओर उजाला करता रहता है,
बिना यह जाने
कि सुबह होने पर
उसे बुझा दिया जाएगा।
मुकेश ,,,,,,,
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