अद्वैत सिद्धान्त : एक सरल परिचय
भारतीय दर्शन की सबसे गहन और प्रभावशाली धाराओं में से एक है — अद्वैत वेदान्त।
“अद्वैत” का अर्थ है — दो नहीं। अर्थात् अन्ततः इस जगत में केवल एक ही परम सत्य है, और वही है — ब्रह्म।
अद्वैत वेदान्त को दार्शनिक रूप से व्यवस्थित करने का महान कार्य आदि शंकराचार्य ने किया, पर इसका मूल आधार प्राचीन उपनिषद् हैं। विशेष रूप से ईशावास्योपनिषद् में अद्वैत सिद्धान्त का अत्यन्त स्पष्ट और गहन स्वरूप मिलता है।
ईशावास्योपनिषद् का प्रथम मंत्र कहता है —
“ईशावास्यमिदं सर्वम्” — अर्थात् यह सम्पूर्ण जगत ईश्वर से व्याप्त है।
यहीं से अद्वैत की मूल भावना प्रकट होती है कि संसार और परम सत्य अलग-अलग नहीं हैं।
सातवें मंत्र में उपनिषद् कहता है —
“यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः ।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥”
अर्थात् जिसने सब प्राणियों में अपने ही आत्मस्वरूप का दर्शन कर लिया, उसके लिए न मोह बचता है, न शोक।
यही अद्वैत का सार है — सबमें एक ही चेतना का अनुभव।
आठवें मंत्र में आत्मा को “अकायम्”, “शुद्धम्”, “अपापविद्धम्”, “स्वयंभूः” कहा गया है। इससे स्पष्ट होता है कि आत्मा शरीर, मन और पाप-पुण्य से परे शुद्ध चेतना है।
अद्वैत के अनुसार मनुष्य स्वयं को शरीर, नाम, जाति या सामाजिक पहचान से जोड़ लेता है, जबकि उसका वास्तविक स्वरूप इन सबसे परे है। उपनिषद् इसी सत्य को “आत्मा” और “ब्रह्म” की एकता के रूप में व्यक्त करते हैं।
इसे समझाने के लिए एक सरल उदाहरण दिया जाता है —
अँधेरे में रस्सी को साँप समझ लेना।
साँप वास्तव में नहीं होता, पर अज्ञान के कारण भय उत्पन्न हो जाता है। जैसे ही प्रकाश होता है, भ्रम मिट जाता है।
अद्वैत कहता है कि आत्मज्ञान वही प्रकाश है।
इस प्रकार ईशावास्योपनिषद् केवल धार्मिक उपदेश नहीं देता, बल्कि यह बताता है कि सम्पूर्ण अस्तित्व के पीछे एक ही सार्वभौम चेतना कार्य कर रही है।
अद्वैत का अर्थ संसार से भागना नहीं, बल्कि सबमें उसी एक सत्य को पहचानना है। जब यह दृष्टि विकसित होती है, तब मनुष्य के भीतर करुणा, समता और शान्ति स्वतः उत्पन्न होने लगती है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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