कई दिनों से
दिल ने किसी चीज़ का नाम लेना छोड़ दिया है।
न इंतज़ार,
न शिकायत,
न किसी आने वाले कल की फ़िक्र।
सुबह जब खिड़की खुलती है,
तो धूप कमरे में वैसे ही चली आती है
जैसे उसे मालूम हो
यहाँ अब कोई सवाल नहीं पूछे जाते।
मैं देर तक
कप में ठंडी होती चाय देखता रहता हूँ,
और बाहर पेड़ों पर बैठी हवा को।
अब चीज़ें
अच्छी या बुरी नहीं लगतीं
बस होती हैं।
बारिश हो
तो उसकी आवाज़ सुन लेता हूँ,
धूप हो
तो थोड़ा-सा उजाला कमरे में रहने देता हूँ।
लोग मिलते हैं,
अपनी बातों, अपने दुखों, अपनी खुशियों के साथ।
मैं उन्हें ध्यान से सुनता हूँ,
जैसे कोई
दूर बहती नदी की आवाज़ सुनता है।
मगर भीतर
कोई लहर नहीं उठती।
शायद यह उदासी भी नहीं,
और सुकून भी नहीं।
बस एक जगह है
जहाँ एहसास
बहुत धीमी चाल से चलते हैं।
जहाँ कुछ भी टूटता नहीं,
और कुछ भी बनता भी नहीं।
कभी-कभी सोचता हूँ
इंसान का आख़िरी ठिकाना
शायद यही होता होगा
एक ऐसी ख़ामोशी,
जहाँ दिल
धड़कता तो है,
मगर किसी के लिए नहीं।
मुकेश ,,,,,,
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