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Sunday, 17 May 2026

समय के मलबे पर (दो )

 समय के मलबे पर (दो )


कुछ आवाज़ें

ढह जाती हैं,

कुछ

ईंटों के बीच फँसी रहती हैं।


मैं आज भी

कभी-कभी

अपना नाम

उसी पुराने ढंग से सुन लेता हूँ।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,

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