“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
समय के मलबे पर (दो )
कुछ आवाज़ें
ढह जाती हैं,
कुछ
ईंटों के बीच फँसी रहती हैं।
मैं आज भी
कभी-कभी
अपना नाम
उसी पुराने ढंग से सुन लेता हूँ।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,
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