ईशावास्योपनिषद् का नवम मंत्र : विद्या-अविद्या, ज्ञान-कर्म और शंकरभाष्य का अद्वैत विवेचन
मूल
मंत्र (यथावत)
अन्धं
तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते ।
ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायां रताः ॥ ९ ॥
मंत्र
का हिंदी अनुवाद
जो लोग अविद्या (कर्ममात्र)
की उपासना करते हैं, वे
अन्धकारमय तम में प्रवेश
करते हैं; और जो
केवल विद्या (देवता-ज्ञान या उपासना) में
ही आसक्त रहते हैं, वे
उससे भी अधिक गहन
अन्धकार में जाते हैं।
शंकरभाष्य
(संशोधित एवं यथावत संस्कृत रूप)
अत्र
आद्येन मन्त्रेण सर्वैषणापरित्यागेन ज्ञाननिष्ठोक्ता — “ईशावास्यमिदं सर्वं… मा गृधः कस्यस्विद्धनम्”
इति। अज्ञानां जिजीविषूणां ज्ञाननिष्ठासम्भवे — “कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः” इति कर्मनिष्ठोक्ता। द्वितीयो
वेदार्थः। अन्योऽसौ निष्ठयोर्विभागो मन्त्रप्रदर्शितो बृहदारण्यकेऽपि प्रदर्शितः — “सोऽकामयत जायामे स्यात्” इत्यादिना। अज्ञस्य कामिनः कर्माणीत्यतः। “मन एवाऽस्यात्मा वाग्जाया”
(बृ. उ. १।४।१७) इत्यादिवचनात्
अज्ञत्वं कामित्वं च कर्मनिष्ठस्य निश्चयेनावगम्यते।
तथा च अत्र कामित्वं
च कर्मणि कुर्वन्त एव जिजीविषवस्तेभ्य इदमुच्यते
— “अन्धं तमः” इत्यादि। कथं
पुनरेवं सर्वेषामिति उच्यते? अकामिनः साध्यसाधनभेदोपमर्देन — “यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः। तत्र को मोहः
कः शोक एकत्वमनुपश्यतः” इति
यदात्मैकत्वविज्ञानं तन्न केनचित्कर्मणा ज्ञानान्तरेण
वा समुच्चीयते। इह तु समुच्चिचीषया
अविद्यादिनिन्दा क्रियते। तत्र च यस्य
येन समुच्चयः सम्भवति न्यायतः शास्त्रतो वा तद्विद्यादेवताविषयज्ञानं तत्कर्मसम्बन्धित्वेनोपन्यस्तं,
न परमात्मज्ञानम्। “विद्यया देवलोकः” (बृ. उ. १।५।१६)
इति पृथक्फलश्रवणात्। तयोर्ज्ञानकर्मणोरिहैकैकानुष्ठाननिन्दा
समुच्चयनिन्दा न, निन्दापरैव। एकैकस्य
पृथक्फलश्रवणात् — “विद्यया तदारोहन्ति”, “विद्यया देवलोकः”, “कर्मणा पितृलोकः” इति। न हि
शास्त्रविहितं किञ्चिदकर्तव्यतामियात्। तत्र अन्धं तमोऽदर्शनात्मकं
तमः प्रविशन्ति। के? येऽविद्याम्। विद्याया
अन्यामविद्यां तां कर्मेत्यर्थः। कर्मणो
विद्याविरोधित्वात्। तामविद्यामग्निहोत्रादिलक्षणामेव
केवलामुपासते तत्पराः सन्तोऽनुतिष्ठन्तीत्यर्थः। ततस्तस्मादन्धात्मकात्तमसो भूय इव बहुतरमेव
ते तमः प्रविशन्ति। के?
कर्म हित्वा ये तु विद्यायामेव
देवताज्ञान एव रताः अभिरताः
॥ ९ ॥
शंकरभाष्य
का हिंदी अनुवाद (यथारूप)
यहाँ
प्रथम मंत्र — “ईशावास्यमिदं सर्वम्… मा गृधः कस्यस्विद्धनम्”
— द्वारा समस्त ऐषणाओं (कामनाओं) का त्याग कर
ज्ञाननिष्ठा का उपदेश किया
गया है।
और
जो अज्ञानी हैं तथा जीने
की इच्छा रखते हैं, उनके
लिए “कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः” — इस मंत्र द्वारा
कर्मनिष्ठा कही गई है।
यही वेद का दूसरा
अर्थ है।
इन
दोनों निष्ठाओं का भेद बृहदारण्यक
उपनिषद् में भी दिखाया
गया है — “सोऽकामयत…” आदि वचनों में।
क्योंकि
कर्म अज्ञानी और कामनायुक्त पुरुष
के लिए हैं।
“मन एवाऽस्यात्मा वाग्जाया” आदि श्रुतियों से
कर्मनिष्ठ पुरुष का अज्ञानी और
कामनायुक्त होना निश्चित रूप
से जाना जाता है।
अतः
यहाँ कर्म करते हुए
जीने की इच्छा रखने
वालों से यह कहा
गया है — “अन्धं तमः…”।
अब
प्रश्न होता है कि
यह सबके लिए कैसे
कहा जा सकता है?
उत्तर
है — जो अकामी हैं
और जिन्होंने साध्य-साधन के भेद
का अतिक्रमण कर लिया है,
उनके लिए “यस्मिन्सर्वाणि भूतानि…”
आदि मंत्र में प्रतिपादित आत्मैकत्वज्ञान
है। उस आत्मज्ञान का
किसी कर्म या अन्य
ज्ञान के साथ समुच्चय
नहीं हो सकता।
यहाँ
समुच्चय की इच्छा रखने
वालों की अविद्या आदि
की निन्दा की जा रही
है।
जहाँ
तक न्याय और शास्त्र से
ज्ञान-कर्म समुच्चय सम्भव
है, वहाँ वह देवता-विषयक ज्ञान है, परमात्मज्ञान नहीं।
क्योंकि श्रुति पृथक्-पृथक् फल बताती है
— “विद्यया देवलोकः”, “कर्मणा पितृलोकः”।
यहाँ
ज्ञान और कर्म में
से किसी एक के
अनुष्ठान की निन्दा नहीं
है, बल्कि दोनों के अनुचित मिश्रण
की निन्दा है।
शास्त्रविहित
कोई भी कर्म निषिद्ध
नहीं हो सकता।
यहाँ
“अन्धं तमः” का अर्थ
है — अज्ञानरूप अन्धकार।
“अविद्या”
से अभिप्राय कर्म है, क्योंकि
कर्म ज्ञान का विरोधी है।
जो
लोग अग्निहोत्र आदि कर्मों में
ही लगे रहते हैं
और केवल उन्हीं का
अनुष्ठान करते हैं, वे
अन्धकार में जाते हैं।
और
जो कर्म का त्याग
कर केवल देवता-ज्ञान
में आसक्त रहते हैं, वे
उससे भी अधिक अन्धकार
में प्रवेश करते हैं।
शोधपूर्ण
निबंध
“ईशावास्योपनिषद्
के नवम मंत्र में विद्या-अविद्या तथा ज्ञान-कर्म का सम्बन्ध : शंकरभाष्य की अद्वैतमीमांसा”
ईशावास्योपनिषद्
का नवम मंत्र उपनिषद्
दर्शन के सबसे गूढ़
और विवादास्पद मंत्रों में से एक
माना जाता है। सामान्यतः
“विद्या” को श्रेष्ठ और
“अविद्या” को त्याज्य माना
जाता है, परन्तु यहाँ
उपनिषद् दोनों में आसक्ति को
अन्धकार का कारण बताता
है। इस रहस्य को
स्पष्ट करने का कार्य
आदि शंकराचार्य अपने भाष्य में
करते हैं।
ज्ञाननिष्ठा
और कर्मनिष्ठा का विभाजन
शंकराचार्य
के अनुसार ईशावास्योपनिषद् के प्रथम दो
मंत्र ही दो पृथक्
मार्गों की स्थापना करते
हैं —
|
मंत्र |
मार्ग |
|
“ईशावास्यमिदं
सर्वम्…” |
ज्ञाननिष्ठा |
|
“कुर्वन्नेवेह
कर्माणि…” |
कर्मनिष्ठा |
ज्ञानमार्ग
उस व्यक्ति के लिए है
जिसने संसार की कामनाओं का
अतिक्रमण कर लिया है।
कर्ममार्ग उस व्यक्ति के
लिए है जो अभी
भी इच्छाओं और जीवन-आसक्ति
से युक्त है।
यहाँ
शंकराचार्य वेदान्त में “अधिकारिभेद” की
अत्यन्त सूक्ष्म स्थापना करते हैं।
“अविद्या”
का अर्थ केवल अज्ञान नहीं
इस मंत्र की सबसे महत्त्वपूर्ण
विशेषता यह है कि
शंकराचार्य यहाँ “अविद्या” का अर्थ केवल
सामान्य अज्ञान नहीं, बल्कि वैदिक कर्मों से करते हैं।
अर्थात्
— अग्निहोत्र /यज्ञ /कर्मकाण्ड
यदि
केवल इन्हीं में मनुष्य उलझा
रहे और आत्मज्ञान की
ओर न बढ़े, तो
वह आध्यात्मिक अन्धकार में रहता है।
यह कर्म का निषेध
नहीं, बल्कि कर्म की सीमा
का निर्धारण है।
“विद्या”
का अर्थ यहाँ परमात्मज्ञान नहीं
शंकराचार्य
एक अत्यन्त सूक्ष्म बात स्पष्ट करते
हैं —
यहाँ “विद्या” शब्द से ब्रह्मज्ञान
नहीं, बल्कि देवता-उपासना सम्बन्धी ज्ञान अभिप्रेत है।
क्योंकि
यदि यहाँ परमात्मज्ञान लिया
जाए, तो उसे अन्धकार
का कारण नहीं कहा
जा सकता।
इसलिए
वे कहते हैं —
- “विद्यया देवलोकः”
- “कर्मणा पितृलोकः”
अर्थात्
दोनों के फल सीमित
हैं।
ज्ञान
और कर्म का समुच्चय
अद्वैत
वेदान्त का एक प्रमुख
सिद्धान्त है कि परमात्मज्ञान
और कर्म का अन्तिम
समुच्चय सम्भव नहीं।
क्यों?
क्योंकि
कर्म “कर्ता” की भावना पर
आधारित है, जबकि आत्मज्ञान
“अकर्ता” स्वरूप का बोध कराता
है।
जब
तक मनुष्य स्वयं को कर्म करने
वाला मानता है, तब तक
अद्वैत का पूर्ण बोध
नहीं हो सकता।
इसीलिए
शंकराचार्य कहते हैं कि
आत्मैकत्वज्ञान किसी कर्म के
साथ संयुक्त नहीं हो सकता।
उपनिषद्
का वास्तविक उद्देश्य
यह मंत्र कर्म का विरोध
नहीं करता; वह आध्यात्मिक यात्रा
की क्रमिकता बताता है।
- कर्म → चित्तशुद्धि देता है
- उपासना → एकाग्रता देती है
- ज्ञान → मोक्ष देता है
अतः
कर्म और उपासना साधन
हैं, किन्तु अंतिम लक्ष्य आत्मज्ञान है।
आधुनिक
सन्दर्भ में अर्थ
आज भी मनुष्य बाह्य
कर्मों, धार्मिक अनुष्ठानों और मानसिक धारणाओं
में उलझा रह सकता
है, परन्तु यदि आत्मदर्शन न
हो तो भीतर का
अन्धकार बना रहता है।
उपनिषद्
हमें बाह्य धार्मिकता से आगे बढ़कर
चेतना के मूल स्वरूप
को जानने की प्रेरणा देता
है।
ईशावास्योपनिषद्
का नवम मंत्र भारतीय
दर्शन में ज्ञान और
कर्म के सम्बन्ध पर
एक अत्यन्त गहन चिन्तन प्रस्तुत
करता है।
आदि
शंकराचार्य अपने भाष्य में
यह स्पष्ट करते हैं कि
कर्म और उपासना आध्यात्मिक
साधना के आवश्यक चरण
हो सकते हैं, किन्तु
मोक्ष का साधन केवल
आत्मज्ञान है।
यह मंत्र मनुष्य को बाह्य कर्मकाण्ड
से भीतर की चेतना
की ओर ले जाता
है — जहाँ अद्वैत का
अनुभव सम्भव होता है, और
जहाँ ज्ञाता, ज्ञान तथा ज्ञेय का
भेद मिटने लगता है।
No comments:
Post a Comment