जैसे कोई पुरानी स्याही काग़ज़ पर लौट आई हो।

 शाम

धीरे-धीरे
कमरे के कोनों में भर रही है,
जैसे कोई पुरानी स्याही
काग़ज़ पर लौट आई हो।

खिड़की के बाहर
आकाश का रंग
निर्णय नहीं कर पा रहा
कि उसे उजाला रहना है
या स्मृति बन जाना है।

मेज़ पर रखा गिलास
आधा पानी से,
आधा पारदर्शिता से भरा है।

मैं उसे छूता हूँ
और अचानक महसूस करता हूँ
कि चीज़ें
अपने उपयोग से अधिक
अपनी चुप्पियों में जीवित रहती हैं।

किताब के भीतर दबा हुआ
एक सूखा पत्ता
इतने वर्षों बाद भी
हरा होने की कोशिश करता है।

समय यहाँ
आगे नहीं बढ़ता —
वह केवल
वस्तुओं की सतह पर
धीरे-धीरे जमता रहता है।

दीवार पर टँगी परछाईं
मेरी हर हरकत के साथ
थोड़ी देर से चलती है,
मानो उसे भी
विश्वास न हो
कि मैं सचमुच यहाँ हूँ।

बहुत देर बाद
जब कमरे में
सिर्फ़ साँसों की आवाज़ बचती है,
मैं महसूस करता हूँ —

मनुष्य शायद
अपने जीवन में
कभी पूरी तरह उपस्थित नहीं होता।

वह हमेशा
थोड़ा-सा कहीं और रहता है,
किसी अदृश्य गलियारे में
अपने ही लौटने की प्रतीक्षा करता हुआ।

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