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Saturday, 16 May 2026

ईशावास्योपनिषद् का ग्यारहवाँ मंत्र : विद्या–अविद्या समुच्चय, मृत्यु–अमृत एवं शंकरभाष्य का दार्शनिक विवेचन

 ईशावास्योपनिषद् का ग्यारहवाँ मंत्र : विद्या–अविद्या समुच्चय, मृत्यु–अमृत एवं शंकरभाष्य का दार्शनिक विवेचन

मूल मंत्र (यथावत)

विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह ।

अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते ॥ ११ ॥

मंत्र का हिंदी अनुवाद

जो व्यक्ति विद्या (देवताज्ञान/उपासना) और अविद्या (कर्मकाण्ड) — दोनों को साथ-साथ जानता है, वह अविद्या (कर्म) द्वारा मृत्यु को पार करके, विद्या (उपासना/ज्ञान) द्वारा अमरत्व (देवतात्मभाव/आत्मिक अमरता) को प्राप्त करता है।

शंकरभाष्य (संशोधित एवं यथावत संस्कृत रूप)

यत एवमतो विद्यां च अविद्यां च देवताज्ञानं कर्म च इत्यर्थः। यस्तत् एतदुभयं सह एकेन पुरुषेण अनुष्ठेयं वेद तस्य एवं समुच्चयकारिणः एव एकपुरुषार्थसम्बन्धः। क्रमेन स्यात् इति उच्यते — अविद्यया कर्मणा अग्निहोत्रादिना मृत्युं स्वाभाविकं तीर्त्वा, विद्यया देवताज्ञानेन अमृतं देवतात्मभावम् अश्नुते प्राप्नोति। तद्धि अमृतमुच्यते यत् देवतात्मभावनम् ॥ ११ ॥

शंकरभाष्य का हिंदी अनुवाद (यथारूप)

इस कारण से यहाँ “विद्या” और “अविद्या” से क्रमशः देवता-ज्ञान (उपासना) और कर्म का अभिप्राय है।

जो व्यक्ति इन दोनों को एक ही पुरुष द्वारा साथ-साथ अनुष्ठान योग्य जानता है, उसके लिए यह समुच्चयकारी दृष्टि ही एक पुरुषार्थ का साधन बनती है।

किन्तु वास्तविक तात्पर्य यह है कि यह क्रम से होना चाहिए।

अर्थात् पहले अविद्या (कर्म) — जैसे अग्निहोत्र आदि — द्वारा मनुष्य स्वाभाविक मृत्यु को पार करता है, और फिर विद्या (देवता-ज्ञान) द्वारा अमृतत्व अर्थात् देवतात्मभाव को प्राप्त करता है।

वही “अमृत” कहलाता है — जो देवता के साथ आत्मभाव का अनुभव है।

शोधपूर्ण निबंध

“ईशावास्योपनिषद् के ग्यारहवें मंत्र में विद्या-अविद्या का समन्वय एवं शंकराचार्य की क्रमिक मुक्ति-मीमांसा”

ईशावास्योपनिषद् का ग्यारहवाँ मंत्र भारतीय वेदान्त परम्परा में एक अत्यन्त सूक्ष्म और विवादास्पद दार्शनिक सिद्धान्त प्रस्तुत करता है। यह मंत्र “विद्या” और “अविद्या” के बीच विरोध नहीं, बल्कि एक क्रमिक आध्यात्मिक यात्रा का संकेत देता है।

आदि शंकराचार्य इस मंत्र की व्याख्या में यह स्पष्ट करते हैं कि यहाँ “समुच्चय” का अर्थ एक साथ समान स्तर पर दोनों का प्रयोग नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक क्रम है।

विद्या और अविद्या का अर्थ

शंकराचार्य के अनुसार —

अविद्या = कर्म (अग्निहोत्र आदि वैदिक कर्मकाण्ड)

विद्या = देवता-उपासना / देवताज्ञान

यहाँ “विद्या” को ब्रह्मज्ञान नहीं माना गया है, बल्कि सगुण उपासना का स्तर समझा गया है।

मृत्यु और अमृत का दार्शनिक अर्थ

मंत्र में “मृत्यु” और “अमृत” का प्रयोग केवल जैविक अर्थ में नहीं है।

मृत्यु = सीमित अस्तित्व, अज्ञान, कर्मबन्धन

अमृत = देवतात्मभाव, उच्च चेतना अवस्था

इस प्रकार यह यात्रा भौतिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक है।

क्रमिक मुक्ति का सिद्धान्त

शंकराचार्य अत्यन्त स्पष्ट रूप से कहते हैं —

यहाँ दोनों साधन एक साथ समान रूप से मोक्ष नहीं देते, बल्कि एक क्रम बनाते हैं:

कर्म → चित्त-शुद्धि

उपासना → मानसिक एकाग्रता

देवतात्मभाव → उच्च अवस्था

यह अद्वैत वेदान्त में “अधिकारिभेद” और “क्रममुक्ति” का आधार है।

“समुच्चय” का वास्तविक अर्थ

शंकराचार्य यह भी स्पष्ट करते हैं कि यह “समुच्चय” वास्तविक एक साथ मिश्रण नहीं है।

यदि दोनों को समान स्तर पर मिला दिया जाए, तो ज्ञान का शुद्ध स्वरूप नष्ट हो जाएगा।

इसलिए वे कहते हैं —

यह क्रमिक प्रक्रिया है, न कि एक साथ साधन।

अमृतत्व का स्वरूप

यहाँ “अमृत” का अर्थ शरीर की अमरता नहीं है।

बल्कि यह है —

देवता के साथ एकत्व

उच्च चेतना का अनुभव

सीमित अहं का विलय

यह अवस्था अद्वैत की ओर अग्रसर एक संक्रमण बिंदु है।

ADWAIT दृष्टि में इसका स्थान

यद्यपि यह मंत्र क्रमिक साधना की बात करता है, परन्तु अद्वैत वेदान्त का अंतिम लक्ष्य इससे आगे है —

अंतिम सत्य = आत्मा और ब्रह्म की एकता

सभी उपासना और कर्म = साधन मात्र

इस प्रकार यह मंत्र साधन-मार्ग को स्पष्ट करता है, न कि अंतिम सत्य को।

ईशावास्योपनिषद् का यह ग्यारहवाँ मंत्र भारतीय आध्यात्मिक परम्परा में एक संतुलित दृष्टि प्रस्तुत करता है — जहाँ कर्म और उपासना दोनों को आध्यात्मिक विकास की आवश्यक सीढ़ियाँ माना गया है।

आदि शंकराचार्य की व्याख्या इस बात को स्पष्ट करती है कि वेदांत किसी एक साधन का विरोध नहीं करता, बल्कि मनुष्य की योग्यता के अनुसार क्रमिक मार्ग प्रस्तुत करता है।

अन्ततः यह मंत्र यह संदेश देता है कि अज्ञान से मुक्ति और उच्च चेतना की प्राप्ति एक क्रमिक आध्यात्मिक यात्रा है, जो साधक को धीरे-धीरे अमृतत्व की ओर ले जाती है।

मुकेश ,,,,,,,,,,,

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