अल्बेयर कामू का सूरज — (गद्यात्मक फिक्शन)
अल्बेयर कामू का सूरज — (गद्यात्मक फिक्शन)
वह आदमी दुनिया को वैसे नहीं देखता था जैसे लोग देखने के आदी थे।
उसके लिए घटनाएँ अर्थ के पीछे नहीं भागती थीं, वे बस घटती थीं — बिना किसी वादे के, बिना किसी न्याय के।
एक दिन वह समुद्र के किनारे खड़ा था। सूरज बहुत तेज़ था, इतना तेज़ कि विचार भी हल्के पड़ने लगे थे।
लहरें आ रही थीं और जा रही थीं, जैसे किसी प्रश्न का उत्तर देने से पहले ही उसे भुला दिया गया हो।
उसे लगा कि सब कुछ बहुत सीधा है — सूरज चमक रहा है, पानी हिल रहा है, हवा चल रही है —
लेकिन इस सीधाई में कोई अर्थ नहीं था, सिर्फ़ उपस्थिति थी।
वह किसी भावना को ज़बरदस्ती नहीं जोड़ता था।
ना खुशी, ना दुख — बस एक स्थिति जिसमें सब कुछ बराबर था, लेकिन कुछ भी अर्थपूर्ण नहीं था।
लोग उससे पूछते थे कि वह क्या सोचता है।
वह अक्सर जवाब नहीं देता था, क्योंकि सोचने और न सोचने के बीच उसके लिए बहुत पतली रेखा थी।
एक दिन उससे कहा गया कि दुनिया में न्याय होना चाहिए।
उसने सूरज की ओर देखा और सोचा कि न्याय शायद एक मानव विचार है, प्रकृति की कोई आवश्यकता नहीं।
धीरे-धीरे उसे यह समझ आने लगा कि जीवन का कोई पूर्व-लिखित अर्थ नहीं है।
और यही समझ उसे डराती नहीं थी — बल्कि शांत कर देती थी।
क्योंकि जब अर्थ नहीं होता, तो झूठे अर्थों का बोझ भी नहीं होता।
वह चलता रहा
न किसी उत्तर की तलाश में,
न किसी प्रश्न के खिलाफ।
बस उस रोशनी में,
जो बिना वजह चमकती है।
मुकेश ,,,,,,,,
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