पंद्रहवाँ तमाशा - आत्ममुग्धता का तमाशा

 पंद्रहवाँ तमाशा - आत्ममुग्धता का तमाशा


अब लोग

आईने कम देखते हैं,

कैमरे ज़्यादा।


हर आदमी

अपने ही चेहरे का

प्रचारक बना घूम रहा है।


उसे दुनिया नहीं चाहिए,

बस

दुनिया की लगातार स्वीकृति चाहिए।


और भीतर

वह उतना ही असुरक्षित है

जितना कोई अकेला बच्चा।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

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