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Monday, 18 May 2026

मुण्डक उपनिषद् - प्रथम मुण्डक, प्रथम खण्ड, चतुर्थ मंत्र

 मुण्डक उपनिषद् - प्रथम मुण्डक, प्रथम खण्ड, चतुर्थ  मंत्र

पराअपरा विद्या का तत्त्वमीमांसात्मक विवेचन : ब्रह्मज्ञान की द्विविध संरचना

मूल मंत्र (संस्कृत में यथावत्)

तस्मै होवाच द्वे विद्ये वेदितव्ये इति स्म यद्ब्रह्मविदो वदन्ति परा चैवापरा ।। ४।।

अन्वय (गद्य रूप में)

सः तस्मै (शौनकाय) उवाच
यत् ब्रह्मविदः वदन्तिद्वे विद्ये वेदितव्ये इति, परा एव अपरा च।

संधि-विच्छेद

· तस्मै = तस्मै 

· होवाच = + उवाच 

· द्वे = द्वे 

· विद्ये = विद्ये 

· वेदितव्ये = वेदितव्ये 

· यद्ब्रह्मविदः = यत् + ब्रह्मविदः 

· परा चैव = परा + + एव 

· अपरा = अपरा +  

 

पद-पदार्थ (शब्दार्थ एवं व्याख्या)

द्वे विद्ये — ‘दो प्रकार की विद्या’; यहाँ ज्ञान की द्विविधा को सूचित करता है।
वेदितव्ये — ‘जाने जाने योग्य’; कर्तव्यबोधक शब्द, जो ज्ञान-प्राप्ति के अनिवार्य लक्ष्य को दर्शाता है।
परा विद्या वह ज्ञान जिससे परम तत्त्व (ब्रह्म) का साक्षात्कार हो।
अपरा विद्या वेद, वेदाङ्ग, कर्मकाण्ड, लौकिक एवं बौद्धिक ज्ञान; जो साधनात्मक है, किन्तु परम नहीं।
ब्रह्मविदः वे मनीषी जो ब्रह्म के तत्त्व को जानने वाले हैं; प्रमाणिक आचार्य।

 

भावार्थ (सरल हिंदी अर्थ)

ऋषि ने शौनक से कहाब्रह्मज्ञानी विद्वान यह कहते हैं कि मनुष्य के लिए दो प्रकार की विद्याएँ जानने योग्य हैंएक परा (उच्च) और दूसरी अपरा (निम्न)

शंकराचार्य भाष्य (संस्कृत में यथावत्)

तस्मै शौनकायाङ्गिरा किलोवाच किमित्युच्यते। द्वे विद्ये वेदितव्ये इति।एवं स्म किल 'यदब्रह्मविदो वेदार्थाभिज्ञा: परमार्थदर्शिनो वदन्ति के ते इत्याह परा परमात्मविद्या। अपरा धर्माधर्मसाधनतत्फलविषया ननु कस्मिन्न्विदिते सर्वविद्धवतीति शौनकेन पृष्टं तस्मिन्वक्तव्येऽपृष्टमाहाङ्गिरा द्वे विद्ये इत्यादिः। नैष दोषः क्रमापेक्षत्वात्प्रतिवचनस्य अपरा हि विद्याऽविद्या सा निराकर्तव्या तद्विषये हि विदिते किञ्चित्तत्त्वतो विदितं स्यादिति।निराकृत्य हि पूर्वपक्षं पश्चात्सिद्धान्तो वक्तव्यो भवतीति न्यायात्।।४।।

शंकर भाष्य का हिंदी अनुवाद

अंगिरा ऋषि ने शौनक से कहायह क्या कहा जाता है कि दो विद्याएँ जानने योग्य हैं’? इसका आशय यह है कि ब्रह्मज्ञानी, वेदार्थ के ज्ञाता, परमार्थ को देखने वाले महापुरुष ऐसा कहते हैं। वे कौन-सी हैं?—परा अर्थात् परमात्मा का ज्ञान, और अपरा अर्थात् धर्म-अधर्म के साधनों और उनके फलों से संबंधित ज्ञान।

शौनक ने यह पूछा था कि किस एक के जानने से सब कुछ ज्ञात हो जाता है?”—उसका उत्तर देना अपेक्षित था, परन्तु अंगिरा ने पहले दो विद्याएँकहकर अप्रत्यक्ष रूप से उत्तर दिया। यह दोष नहीं है, क्योंकि उत्तर क्रमबद्ध होता है। अपरा विद्या वस्तुतः अविद्या है, जिसे पहले निरस्त करना आवश्यक है। क्योंकि उसके विषय में जान लेने पर भी तत्त्वतः कुछ भी ज्ञात नहीं होता। अतः पहले पूर्वपक्ष का खंडन कर, फिर सिद्धांत का प्रतिपादन करना न्यायसंगत है।

दार्शनिक एवं ज्ञानमीमांसात्मक विश्लेषण

यह मंत्र उपनिषद् के समस्त ज्ञान-दर्शन का आधार प्रस्तुत करता है। यहाँ ज्ञान को दो स्तरों में विभाजित किया गया है

() अपरा विद्या

यह समस्त लौकिक, वैदिक, कर्मकाण्डीय तथा बौद्धिक ज्ञान का क्षेत्र है। इसमें वेद, व्याकरण, ज्योतिष, छन्द आदि सम्मिलित हैं। यह साधनात्मक ज्ञान हैजीवन को व्यवस्थित करता है, किन्तु मुक्ति नहीं देता।

 

() परा विद्या

यह ब्रह्मविद्या हैजिससे आत्मा और ब्रह्म की अभिन्नता का बोध होता है। यही मोक्ष का साधन है।

ज्ञान की श्रेणियाँ

यह विभाजन आधुनिक भाषा में “Higher Knowledge” (transcendental realization) और “Lower Knowledge” (empirical knowledge) के रूप में देखा जा सकता है।

आत्माब्रह्म संबंध

परा विद्या का लक्ष्य हैआत्मा और ब्रह्म की एकता का प्रत्यक्ष अनुभव (अहं ब्रह्मास्मि)

प्रमाण (Means of Knowledge)

अपरा विद्या मुख्यतः प्रत्यक्ष, अनुमान आदि पर आधारित है, जबकि परा विद्या श्रुति और अनुभूति पर आधारित है।

शोधात्मक निबंध 

मुण्डक उपनिषद् का यह चतुर्थ मंत्र भारतीय ज्ञानमीमांसा का एक मूलाधार प्रस्तुत करता है, जिसमें ज्ञान को दो स्तरोंपरा और अपरामें विभाजित किया गया है। यह विभाजन केवल वर्गीकरण नहीं, बल्कि एक दार्शनिक यात्रा का संकेत है, जिसमें साधक को निम्नतर ज्ञान से उच्चतर सत्य की ओर अग्रसर किया जाता है।

अपरा विद्या में वेद, वेदाङ्ग, व्याकरण, ज्योतिष आदि सभी शास्त्र सम्मिलित हैं। यह ज्ञान मानव जीवन के संगठन, सामाजिक व्यवस्था और कर्मकाण्ड के निर्वहन के लिए आवश्यक है। परन्तु उपनिषद् इसे अंतिम सत्य नहीं मानते। शंकराचार्य इसे अविद्याकी संज्ञा देते हैं, क्योंकि यह आत्मा के वास्तविक स्वरूप को प्रकट नहीं करता।

इसके विपरीत, परा विद्या वह है जिससे ब्रह्म का साक्षात्कार होता है। यह ज्ञान तो केवल बौद्धिक है और ही केवल सैद्धांतिकयह अनुभवात्मक (experiential) है। यहाँ ज्ञान का अर्थ हैअस्तित्व के साथ एकात्मता का बोध।

यदि इसे आधुनिक परिप्रेक्ष्य में देखें, तो अपरा विद्या को “Information” और परा विद्या को “Wisdom” कहा जा सकता है। आज के डिजिटल युग में मनुष्य के पास अपार सूचना (data) है, किन्तु वह बोध (realization) से वंचित है। यही कारण है कि बाह्य प्रगति के बावजूद आंतरिक शांति का अभाव बना हुआ है।

शंकराचार्य का अद्वैत वेदान्त इस मंत्र को एक विशेष गहराई प्रदान करता है। उनके अनुसार, अपरा विद्या का परित्याग आवश्यक है, क्योंकि यह केवल प्रतीकात्मक और साधनात्मक है। जब तक साधक इससे परे नहीं जाता, तब तक वह ब्रह्म के तत्त्व को नहीं जान सकता।

अतः यह मंत्र केवल ज्ञान का वर्गीकरण नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक मार्गदर्शन हैजो हमें यह सिखाता है कि जीवन का परम लक्ष्य केवल जानना नहीं, बल्कि हो जानाहै।

 

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