अनुपस्थिति का संग्रहालय
(एक आन्तरिक एकालाप)
मेरे भीतर
एक जगह ऐसी है
जहाँ अब कोई नहीं रहता,
फिर भी
वहाँ लगातार किसी की उपस्थिति महसूस होती है।
शायद
यही अनुपस्थिति का वास्तविक स्वरूप है
वह खाली नहीं करती,
भर देती है।
मैं अपने भीतर
एक पुराने संग्रहालय की तरह चलता हूँ।
यहाँ
कुछ बंद कमरे हैं,
कुछ धूल से ढकी हुई स्मृतियाँ,
कुछ आवाज़ें
जो अब केवल गूँज बन चुकी हैं।
एक दीर्घा में
किसी की हँसी टँगी हुई है।
दूसरी में
एक अधूरा संवाद।
एक कोने में
किसी का अंतिम स्पर्श
अब भी ताप की तरह रखा है।
मैं रोज़
इन सबके बीच से गुजरता हूँ,
लेकिन किसी चीज़ को छूता नहीं।
क्योंकि स्मृतियाँ
बहुत नाज़ुक होती हैं।
उन्हें छुओ
तो वे टूटती नहीं,
तुम्हें तोड़ देती हैं।
लोग पूछते हैं
तुम इतने चुप क्यों रहते हो?
मैं क्या कहूँ
कि मेरे भीतर
बहुत-सी मृत चीज़ें अब भी जीवित हैं।
वे रात में उठती हैं,
चलती हैं,
धीरे-धीरे मेरे कंधों पर हाथ रखती हैं,
और फिर
मुझे सोने नहीं देतीं।
कभी-कभी
मुझे लगता है
मनुष्य का हृदय
वास्तव में कोई अंग नहीं,
एक पुरातत्त्व-स्थल है।
जहाँ
प्रेम, हानि, प्रतीक्षा, पश्चाताप
सब परत-दर-परत दबे रहते हैं।
और जीवन?
शायद
सिर्फ़ इतना कि
तुम इन अवशेषों के बीच
बिना पूरी तरह बिखरे
चलते रहो।
धीरे-धीरे
मैंने यह भी समझ लिया है
कि कुछ लोग
हमारी ज़िंदगी से जाते नहीं।
वे बस
अपनी भौतिक आकृति छोड़कर
हमारी चेतना का हिस्सा बन जाते हैं।
और तब
हर वस्तु,
हर मौसम,
हर गीत
उनकी ओर खुलने वाला एक दरवाज़ा बन जाता है।
यही कारण है
कि कुछ स्मृतियाँ
समय के साथ धुँधली नहीं होतीं।
वे
पत्थर पर खुदे हुए अक्षरों की तरह
हमारे भीतर बनी रहती हैं
मौन,
स्थिर,
और असहनीय रूप से जीवित।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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