ऑक्टावियो पाज़ की कविता से प्रेरित
रात किसी बंद आँख की तरह नहीं आती
वह खुली हुई स्मृति है
जिसमें समय अपने ही पदचिह्न मिटाता चलता है
मैंने अपने नाम को छुआ
तो वह किसी और की हथेली में लिखा मिला
और वह हथेली भी
किसी तीसरे सपने की देह में खो गई थी
प्रेम कोई घटना नहीं
न आरंभ, न अंत
वह तो दो मौन के बीच
टिकती हुई एक अनिश्चित कंपन है
दीवारें बोलती नहीं
पर वे हर शब्द को लौटाकर बदल देती हैं
जैसे भाषा भी
अपने अर्थ से थक चुकी हो
मैंने देखा—
एक स्त्री अपने भीतर चल रही थी
और उसका प्रतिबिंब
किसी अनदेखे जल में धीरे-धीरे टूट रहा था
शहर नहीं बसते पत्थरों से
वे बसते हैं उन चीज़ों से
जो कभी कही नहीं गईं
पर हमेशा सुनी जाती रहीं
यह जीवन कोई सीधा मार्ग नहीं
यह एक दर्पण है
जो देखने वाले को भी देखता है
और धीरे-धीरे
उसे उसकी ही परछाईं से अलग कर देता है
अंत में
मैं वहाँ पहुँचता हूँ जहाँ प्रश्न भी मौन हो जाते हैं
और उत्तर
अपने ही अर्थ से बाहर खड़ा रहता है
मुकेश ,,,,,,,,,,
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