होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Friday, 15 May 2026

प्लेटफ़ॉर्म : पहली नज़्म

 प्लेटफ़ॉर्म : पहली नज़्म

प्लेटफ़ॉर्म पर

हर आदमी

कहीं न कहीं जाने की जल्दी में था,

लेकिन कुछ चेहरे ऐसे भी थे

जो शायद

किसी के लौट आने का इंतज़ार कर रहे थे।


लाउडस्पीकर पर

टूटी हुई आवाज़ में

एक और गाड़ी के लेट होने की सूचना थी,

और भीड़

अपनी थकान को

चाय के कुल्हड़ों से उठती भाप में

धीरे-धीरे घोल रही थी।


एक बूढ़ा कुली

लाल कमीज़ के भीतर

अपनी उम्र छुपाए

अब भी बोझ उठा रहा था,

जैसे ज़िंदगी

उसे रुकने की इजाज़त नहीं देती।


पटरियों के उस पार

धुँध में डूबी रोशनियाँ थीं,

और इस पार

लोगों की आँखों में

अपने-अपने शहर चमक रहे थे।


एक बच्चा

खिड़की वाली सीट के लिए रो रहा था,

एक औरत

बार-बार अपने बैग की ज़िप टटोलती थी,

और एक आदमी

मोबाइल की स्क्रीन पर झुककर

शायद किसी अधूरी मोहब्बत को

“मैं पहुँचकर बात करता हूँ” लिख रहा था।


फिर अचानक

दूर से आती रोशनी ने

सारी बातचीतों को हिला दिया

रेल धीरे-धीरे प्लेटफ़ॉर्म में दाख़िल हुई

जैसे कोई पुराना सपना

लौट आया हो।


और मैं सोचता रहा

ज़िंदगी भी शायद

एक लंबा प्लेटफ़ॉर्म ही है,

जहाँ लोग मिलते कम हैं,

गुज़र ज़्यादा जाते हैं।


मुकेश ,,,,,,,

No comments:

Post a Comment