मैं ज़िंदगी को काट रहा हूँ, या ज़िंदगी मुझको?
मैं ज़िंदगी को काट रहा हूँ,
या ज़िंदगी मुझको काट रही है
ये फ़ैसला अब धुंधला-सा लगता है।
ख़्वाबों की दीवारों पर
कुछ निशान रह गए हैं पुराने,
जैसे कोई सवाल
जो किसी पुराने संदूक़ की तह में दबा रह गया हो।
हर सुबह एक नई दरार लेकर आती है
और हर शाम,
एक और हिस्सा ढह जाता है वजूद का।
रातें अब वो नहीं रहीं
जो कभी चाँदनी में भीगती थीं,
अब तो अंधेरों के हाथों बिक गई हैं,
छूटे हुए वक़्त की तरह।
ख़ामोशियाँ चीख़ती हैं
और सन्नाटे अब बख़ूबी जानते हैं मेरा नाम।
मैं मुस्कराता हूँ
कभी बेवजह,
कभी बस इस भ्रम में
कि शायद कोई देख रहा हो मुझे
काटते हुए ख़ुद को
ज़िंदगी की धार पर।
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