तीसरा तमाशा
तीसरा तमाशा
मुहल्ले के नुक्कड़ पर
आज फिर भीड़ जमा थी।
कोई बूढ़ा आदमी
अपनी दवाइयों की पर्ची लिए
बहुत देर से खड़ा था,
और लोग
उसकी साँसों से ज़्यादा
उसकी बेबसी का हाल पूछ रहे थे।
एक आदमी ने धीरे से कहा
“सुना है बेटों ने घर से निकाल दिया…”
दूसरे ने चाय की चुस्की लेकर जवाब दिया
“अरे, पूरा किस्सा पता करो…
ऐसी कहानियाँ रोज़ कहाँ मिलती हैं!”
फिर देखते ही देखते
उस बूढ़े की ज़िन्दगी
मुहल्ले की सबसे ताज़ा ख़बर बन गई।
कोई उसकी मदद नहीं कर रहा था,
बस उसके दुख को
अपने-अपने अंदाज़ में सजाकर
आगे पहुँचा रहा था।
एक औरत ने अफ़सोस जताया,
मगर आँखों में हल्की-सी चमक थी
जैसे किसी और का उजड़ना
उसे अपने घर की सलामती का सबूत दे रहा हो।
हम अजीब दौर में जी रहे हैं—
जहाँ लोग
रिश्तों की राख पर हाथ सेंकते हैं।
किसी की नौकरी चली जाए,
तो हम कहते हैं
“अरे! आजकल तो बहुत बुरा समय है…”
मगर भीतर कहीं
एक धीमी राहत भी पलती है
कि अच्छा हुआ
यह हादसा हमारे साथ नहीं हुआ।
किसी की शादी टूटे,
तो सहानुभूति कम
जिज्ञासा ज़्यादा जागती है।
हम पूछते नहीं
“तुम ठीक हो?”
हम पूछते हैं
“असल वजह क्या थी?”
दर्द अब दर्द नहीं रहा,
एक दिलचस्प सामग्री बन गया है।
हमारे भीतर
एक अदृश्य दर्शक बैठा है
जो हर टूटते हुए आदमी को
एक एपिसोड की तरह देखता है।
और सबसे भयावह बात यह है
हमें अब अपने इस पतन पर
शर्म भी नहीं आती।
हम बस इंतज़ार करते हैं
कि अगला तमाशा कहाँ होगा,
किसके घर का सन्नाटा
कल की बातचीत बनेगा।
क्योंकि
इस समय की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं
कि लोग दुखी हैं
बल्कि यह है
कि लोग
दूसरों के दुख से मनोरंजन करने लगे हैं।
मुकेश ,,,,,,
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