जो अपने भीतर अधिक बोलते हैं
(एक आन्तरिक एकालाप)
कुछ लोग
दुनिया से कम बात करते हैं,
लेकिन अपने भीतर
बहुत अधिक।
वे बाहर से शांत दिखते हैं,
जैसे सब कुछ समझ चुके हों,
लेकिन भीतर
एक पूरा नगर चलता रहता है
प्रश्नों का,
संवादों का,
और अनकहे उत्तरों का।
मैंने ऐसे लोगों को देखा है
जो भीड़ में भी अकेले रहते हैं,
और अकेले होकर भी
कभी खाली नहीं होते।
उनकी आँखों में
एक धीमा-सा संवाद चलता रहता है
किसी ऐसे व्यक्ति से
जो वहाँ मौजूद नहीं है।
वे बात नहीं करते,
क्योंकि उनके भीतर
बहुत कुछ पहले से चल रहा होता है।
शायद यही कारण है
कि उन्हें समझना आसान नहीं होता।
वे अपने शब्दों को
दुनिया में खर्च नहीं करते,
उन्हें भीतर ही संजोए रखते हैं
जैसे कोई
बहुत कीमती चीज़ को
बाहर की हवा से बचा रहा हो।
कभी-कभी
मुझे लगता है
कि ऐसे लोग
अपने जीवन को नहीं,
अपने ही विचारों को जी रहे होते हैं।
उनका मौन
खाली नहीं होता,
वह भरा हुआ होता है
अनकहे वाक्यों से।
और सबसे अजीब बात यह है
वे जितना कम बोलते हैं
उतना ही अधिक सुनते हैं,
लेकिन किसी और को नहीं,
अपने ही भीतर उठती हुई आवाज़ों को।
क्या यह आत्म-संवाद
मनुष्य को गहरा बनाता है
या धीरे-धीरे
दुनिया से दूर कर देता है?
शायद दोनों ही सच हैं।
क्योंकि जो भीतर अधिक जीता है
वह बाहर से थोड़ा कम बचता है।
फिर भी
उनकी आँखों में
एक तरह की शांति होती है
जैसे उन्होंने
अपने ही भीतर
किसी अनंत गलियारे में
रास्ता ढूँढ लिया हो।
मुकेश ,,,,,,,,,
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