इसी कुएँ में एक विधवा भी कूद गई थी।

 सुना है

बहुत वर्षों पहले
इसी कुएँ में
एक विधवा भी कूद गई थी।

लोग कहते हैं
वह अपने भीतर पलते
एक अवैध गर्भ की बदनामी से डर गई थी।

पर सच क्या था,
अब कौन जाने।

गाँवों की स्मृतियाँ
अक्सर
आधे सच
और आधे भय से बनी होती हैं।

बस इतना बचा है
कि बरसात की कुछ रातों में
जब पानी थोड़ा बढ़ जाता है,
तो कुएँ की दीवारों से
एक बहुत धीमी-सी सिसकी उतरती महसूस होती है।

कोई कहता है
वह हवा है।
कोई कहता है
पुरानी नमी।

लेकिन मुझे हमेशा लगता है
कि इस कुएँ ने
सिर्फ़ पानी नहीं सँभाला,
मनुष्यों की लज्जा,
भय,
और वे जीवन भी
जिन्हें समाज ने
अपने बाहर खड़ा कर दिया था।

शायद इसी कारण
इसकी तली का अँधेरा
दूसरे कुओं से थोड़ा अधिक गहरा है।

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