रेलगाड़ी में बैठा वह आदमी
(स्टेफ़न ज़्वाइग की मनोवैज्ञानिक शैली से प्रेरित कथा)
वह सुबह का समय था, जब धूप अभी पूरी तरह जागी नहीं थी और प्लेटफ़ॉर्म पर फैली हुई हल्की धुंध मानो किसी अधूरी याद की तरह हवा में अटकी हुई थी।
रेलवे स्टेशन पर भीड़ थी—लेकिन वह भीड़ शोर नहीं कर रही थी, जैसे हर कोई अपने भीतर कुछ दबाए हुए हो। किसी को कहीं पहुँचना था, किसी को लौटना था, और कुछ लोग बस इसलिए खड़े थे कि खड़े रहना भी एक तरह की मजबूरी होती है।
उसी भीड़ में वह आदमी भी था।
उसका नाम किसी को नहीं पता था, और शायद स्वयं उसे भी यह कभी महत्वपूर्ण नहीं लगा था। वह एक पुराना चमड़े का सूटकेस पकड़े था, जिसके कोनों पर समय ने हल्की दरारें बना दी थीं। उसकी आँखों में एक अजीब-सी स्थिरता थी—न पूर्ण शांति, न स्पष्ट बेचैनी। बस एक ऐसा मौन जो किसी पुराने अपराध के बाद मनुष्य अपने भीतर पाल लेता है।
ट्रेन आई और रुकी नहीं—बल्कि जैसे किसी थके हुए जानवर की तरह हांफती हुई खड़ी हो गई। लोग चढ़ने लगे। धक्का, पुकार, सीटों की खोज, और उन सबके बीच एक अनदेखी घबराहट।
वह आदमी खिड़की के पास जाकर बैठ गया।
और जैसे ही वह बैठा, बाहर का दृश्य धीरे-धीरे पीछे छूटने लगा—पेड़, घर, सड़कें—सब कुछ मानो उसके भीतर की किसी स्मृति को खींचकर ले जा रहा हो।
ट्रेन के डिब्बे में उसके सामने एक स्त्री बैठी थी।
उम्र शायद चालीस के आसपास, लेकिन चेहरे पर समय ने उतना अधिकार नहीं जताया था जितना उसकी आँखों में किसी अधूरे निर्णय की थकान थी।
उन दोनों ने एक-दूसरे को देखा नहीं—पर महसूस अवश्य किया।
क्योंकि कुछ मुलाक़ातें दृष्टि से नहीं, बल्कि उस खालीपन से होती हैं जो दो लोगों के बीच अचानक पैदा हो जाता है।
थोड़ी देर बाद ट्रेन की गति बढ़ी। खिड़की के बाहर दृश्य धुंधले होने लगे।
स्त्री ने अचानक अपने बैग से एक पत्र निकाला। वह उसे खोल नहीं रही थी—बस बार-बार उंगलियों से उसके किनारों को छू रही थी, जैसे कागज़ नहीं बल्कि कोई जीवित स्मृति हो।
वह आदमी यह देख रहा था, बिना देखे।
और फिर अचानक स्त्री ने कहा
“क्या आपने कभी कोई ऐसा पत्र रखा है जिसे आप पढ़ना नहीं चाहते, लेकिन फेंक भी नहीं सकते?”
आवाज़ सामान्य थी, लेकिन उसमें एक टूटे हुए विश्वास की हल्की कंपन थी।
आदमी ने पहले उत्तर नहीं दिया। जैसे उसने प्रश्न को अपने भीतर कहीं रख लिया हो और उसकी परतें खोल रहा हो।
फिर बहुत धीमे से बोला
“जो पत्र हम फेंक नहीं पाते… वे शायद हमारे भीतर पहले से लिखे जा चुके होते हैं।”
स्त्री ने उसकी ओर देखा। पहली बार।
उस दृष्टि में आश्चर्य नहीं था। केवल पहचान का एक धुंधला-सा कंपन था—जैसे किसी पुराने जीवन का दरवाज़ा थोड़ी देर के लिए खुल गया हो।
ट्रेन एक छोटे स्टेशन पर रुकी। बाहर बारिश शुरू हो चुकी थी।
खिड़की पर पानी की बूँदें गिर रही थीं, और हर बूँद अपने साथ किसी अनकहे शब्द को तोड़ रही थी।
स्त्री ने धीरे से कहा
“मैंने उसे लिखकर नहीं भेजा था। पर वह फिर भी चला गया।”
अब उसके स्वर में वह संतुलन टूट चुका था जिसे वह अब तक संभाल रही थी।
आदमी ने बाहर देखा। बारिश तेज़ हो रही थी।
और फिर उसने कहा
“कभी-कभी पत्र नहीं जाते… हम स्वयं चले जाते हैं। किसी और के भीतर।”
यह कहते हुए उसकी आँखें थोड़ी देर के लिए बंद हो गईं।
जैसे वह किसी पुराने कमरे में लौट गया हो, जहाँ किसी ने कभी दरवाज़ा बंद नहीं किया था, बस समय ने उसे जंग लगा दिया था।
ट्रेन फिर चल पड़ी।
स्त्री अब पत्र को देख नहीं रही थी। उसने उसे धीरे से मोड़कर अपने बैग में रख दिया।
और पहली बार उसके चेहरे पर एक हल्की-सी थकान के साथ शांति थी।
मानो किसी प्रश्न का उत्तर मिल गया हो—या यह स्वीकार कर लिया गया हो कि कुछ प्रश्नों का उत्तर होना आवश्यक नहीं होता।
आदमी ने खिड़की से बाहर देखा।
बारिश अब धीमी हो गई थी। दूर कहीं धुंध के बीच एक गाँव दिखाई दे रहा था—छोटा, साधारण, लेकिन किसी भूले हुए जीवन की तरह वास्तविक।
उसने अपने सूटकेस पर हाथ रखा।
और बिना किसी विशेष कारण के, उसे लगा कि वह जिस यात्रा पर निकला था, वह वास्तव में बाहर नहीं थी।
वह भीतर की किसी ट्रेन में बैठा था, जो हमेशा चलती रहती है—और कभी अपने गंतव्य पर नहीं पहुँचती।
और उसी क्षण, जैसे किसी अदृश्य संकेत पर, दोनों ने एक-दूसरे की ओर देखा
इस बार कोई प्रश्न नहीं था।
कोई उत्तर नहीं था।
सिर्फ एक ऐसा मौन, जिसमें दो अजनबी मनुष्य एक-दूसरे के भीतर थोड़ी देर के लिए रह लिए थे।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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