उपस्थिति की छायाएँ - वह जो प्रतिक्रिया नहीं देती
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लखनऊ की साउथ सिटी की उस शाम में हवा कुछ अलग तरह से ठहरी हुई थी।
गर्मियों के बाद की वह नरम होती हुई हवा, जिसमें धूप भी थकी हुई लगती है और पेड़ों की छायाएँ भी थोड़ा देर से हिलती हैं।
वही बंगला अब भी वहीं था — सफ़ेद, शांत, अपने भीतर किसी अनकहे संतुलन के साथ।
पाम के दो पेड़ अब भी गेट के दोनों ओर खड़े थे।
वे वैसे ही थे — न अधिक जीवित, न अधिक निर्जीव। बस समय के साथ समझौता कर चुके।
और वह स्त्री।
वह अब भी उसी तरह थी — जैसे समय ने उसे छुआ हो, मगर बदलने की अनुमति न ली हो।
उसमें एक अजीब-सा स्थिर भाव था।
वह न किसी को पास आने के लिए कहती थी,
न ही किसी को दूर जाने से रोकती थी।
लोग आते-जाते रहते।
कुछ देर रुकते।
कुछ प्रश्न करते।
कुछ अपनी बातें छोड़कर चले जाते।
लेकिन वह किसी को भी अपने भीतर प्रवेश करने का निमंत्रण नहीं देती थी।
और न ही किसी के जाने पर कोई खालीपन दिखाती थी।
जैसे संबंधों का उसके भीतर कोई आग्रह ही न हो —
केवल उपस्थिति की अनुमति हो।
वह बातें सुनती थी,
पर बहुत गहराई से नहीं —
जैसे शब्द उसके भीतर उतरने से पहले ही किसी शांत सतह से टकराकर लौट जाते हों।
फिर भी अजीब बात यह थी कि वह दूसरों के दर्द को समझ लेती थी।
बिना प्रश्न किए।
बिना प्रतिक्रिया दिए।
कभी कोई उसके सामने बैठकर कुछ कहता, तो वह बस हल्का-सा सिर हिला देती।
उसकी आँखों में एक क्षण के लिए ऐसी करुणा आ जाती जो शब्दों से नहीं बनती।
और फिर वह तुरंत उस भाव से भी दूर हट जाती।
जैसे भावनाओं में डूब जाना भी उसके लिए अनावश्यक विलास हो।
वह सहानुभूति रखती थी,
पर उसमें खोती नहीं थी।
शायद इसलिए वह हमेशा थोड़ी दूर लगती थी —
निकट होते हुए भी।
उसके जीवन में कोई तेज़ प्रतिक्रिया नहीं थी।
न किसी के आने पर उत्साह,
न किसी के जाने पर टूटन।
केवल एक धीमी, निरंतर उपस्थिति।
और यही बात उसे असाधारण बनाती थी।
वह बाग़ के झूले पर बैठती,
धीरे-धीरे झूलती,
कभी चाय पीती,
कभी बस यूँ ही दूर देखती।
उसकी चाल वही थी — बहुत धीमी, बहुत संतुलित।
साड़ी का पल्लू वह ऐसे ठीक करती जैसे वह कोई अभ्यास नहीं, बल्कि स्वभाव हो।
और डिम्पल—
वे अब भी थे।
लेकिन अब वे केवल मुस्कान का हिस्सा नहीं लगते थे।
वे जैसे उसके चेहरे पर समय के बहुत हल्के हस्ताक्षर हों —
जो हर बार उसकी उपस्थिति को और गहरा कर देते थे।
लोग उसे देखते थे और अक्सर यह तय नहीं कर पाते थे कि वह खुश है या उदास।
क्योंकि वह दोनों में से कुछ भी स्पष्ट रूप से नहीं थी।
वह बस थी।
और शायद यही सबसे कठिन अवस्था होती है —
जब मनुष्य किसी भावना में नहीं, बल्कि एक निरंतर शांति में जीने लगता है।
मैं जब भी उस सड़क से गुजरता,
मुझे लगता कि वह किसी कहानी का हिस्सा नहीं है।
वह खुद एक अधूरी कहानी की तरह है —
जो न शुरू होती है, न समाप्त।
और फिर भी लगातार चलती रहती है।
कभी-कभी मन में यह विचार आता कि लोग उसे गलत समझते हैं।
वे उसे रहस्यमय कहते हैं।
अकेली कहते हैं।
दूर कह देते हैं।
लेकिन वह न तो दूर थी,
न अकेली — उस अर्थ में जिसमें लोग अकेलापन समझते हैं।
वह बस किसी ऐसी जगह पर खड़ी थी जहाँ संबंधों का शोर कम हो जाता है,
और मनुष्य स्वयं को थोड़ा स्पष्ट सुन पाता है।
और शायद इसलिए,
उसकी चुप्पी किसी खालीपन की नहीं,
बल्कि एक बहुत गहरे संतुलन की तरह लगती थी।
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