आज सुबह
दरवाज़ा खोलते ही
मुझे लगा
गलियारा थोड़ा लम्बा हो गया है।
अंत में लगी खिड़की
पहले से ज़्यादा दूर थी,
और वहाँ से आती रोशनी
किसी दूसरे मौसम की लग रही थी।
मैं धीरे-धीरे चला
जैसे अस्पतालों में चलते हैं लोग —
बिना किसी निश्चित डर के,
लेकिन पूरी तरह निश्चिन्त भी नहीं।
रास्ते में
दीवार पर टँगी एक तस्वीर
टेढ़ी मिली।
उसमें जो आदमी मुस्कुरा रहा था
उसे मैं पहचानता था,
हालाँकि
वह मैं नहीं था।
रसोई में
केतली बहुत देर तक
उबलती रही।
उसकी आवाज़ में
एक अजीब हड़बड़ी थी,
जैसे पानी नहीं,
समय खौल रहा हो भीतर।
मैंने कप में चाय डाली
तो भाप उठी
और कुछ क्षणों के लिए
मुझे लगा
कोई अदृश्य चेहरा
मेरे बहुत पास आ गया है।
बाहर
पेड़ों पर धूप थी,
लेकिन सड़क पर चलते लोग
ऐसे लग रहे थे
जैसे वे अपने-अपने सपनों से
निकाले जा चुके हों।
शाम तक
घर फिर सामान्य हो गया।
गलियारा
अपनी पुरानी लम्बाई में लौट आया,
तस्वीर सीधी हो गई,
और केतली चुप।
सिर्फ़ मेरे भीतर
कुछ हल्का-सा बदल गया था,
जिसका नाम
मैं अब तक नहीं जानता।
— मुकेश
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