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Saturday, 16 May 2026

अँधेरे में बची हुई आकृति

 अँधेरे में बची हुई आकृति

(एक आन्तरिक एकालाप)

अब जबकि

धीरे-धीरे

मेरे भीतर की अनेक आवाज़ें शांत हो चुकी हैं,

मैं अपने ही मौन को

पहचानना सीख रहा हूँ।


पहले

मुझे लगता था

मनुष्य अपने विचारों से बना है।

अब समझ में आता है

वह अपनी अनुपस्थितियों से बनता है।


जो नहीं मिला,

जो छूट गया,

जो कभी कहा नहीं जा सका

वही भीतर

सबसे अधिक जगह घेरता है।


मैंने जीवन में

बहुत-सी चीज़ों को बचाए रखने की कोशिश की

कुछ संबंध,

कुछ विश्वास,

कुछ स्वप्न।


लेकिन समय

धीरे-धीरे

हर चीज़ को अपनी तरफ़ खींच लेता है।


तुम रोक नहीं सकते।


तुम सिर्फ़

देख सकते हो

कि कैसे एक दिन

कोई बहुत प्रिय चेहरा

स्मृति की धुंध में बदलने लगता है।


और यह

मनुष्य की सबसे गहरी पराजय है

कि वह

भूलना नहीं चाहता,

फिर भी भूलता चला जाता है।


मैं कई बार

रात के अंतिम पहर में

अपने कमरे की बत्ती बुझाकर बैठता हूँ।


अँधेरे में

चीज़ें अपना वास्तविक आकार खो देती हैं।

मेज़, कुर्सियाँ, किताबें

सब एक समान छाया में बदल जाते हैं।


शायद मृत्यु भी

ऐसा ही कोई अँधेरा है

जहाँ व्यक्तित्व मिट जाते हैं

और केवल अस्तित्व बचता है।


लेकिन फिर मैं सोचता हूँ

यदि सब कुछ मिट ही जाना है

तो मनुष्य प्रेम क्यों करता है?

क्यों किसी की आवाज़

वर्षों बाद भी भीतर गूँजती रहती है?

क्यों एक छोटा-सा स्पर्श

पूरे जीवन पर छाया रह सकता है?


शायद इसलिए

कि नश्वरता ही

प्रेम को इतना असहनीय रूप से सुंदर बनाती है।


यदि सब शाश्वत होता,

तो किसी के खो जाने का भय न होता।

और बिना भय के

शायद प्रेम भी इतना गहरा न होता।


इसलिए

अब मैं दुख से भागता नहीं।


मैं जानता हूँ

जिस मनुष्य ने

सचमुच प्रेम किया है,

उसके भीतर

कहीं-न-कहीं

एक स्थायी शोक अवश्य रहेगा।


मुकेश' ,,,,,,,,,,,,,


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