सड़क किनारे बैठा आदमी
(अल्बेर कामू की शैली से प्रेरित)
दोपहर बहुत गर्म थी।
सड़क धूप में सफ़ेद चमक रही थी और लोग जल्दी-जल्दी अपने कामों में लगे हुए थे।
एक आदमी सड़क किनारे पत्थर पर बैठा था।
वह कोई भिखारी नहीं था। उसके कपड़े साफ़ थे। चेहरा साधारण था। लेकिन उसके बैठने के ढंग में कुछ ऐसा था जैसे वह कहीं जाने की जल्दी में नहीं है।
लोग उसके पास से गुजरते रहे।
कुछ देर बाद एक लड़का उसके सामने रुका और बोला,
“आप यहाँ क्यों बैठे हैं?”
आदमी ने थोड़ी देर उसे देखा। फिर कहा,
“थक गया हूँ।”
लड़के ने सहजता से पूछा,
“काम से?”
आदमी हल्का-सा मुस्कुराया।
“नहीं। अर्थ ढूँढने से।”
लड़का उसकी बात नहीं समझा। वह चला गया।
दोपहर और गर्म हो गई।
आदमी ने सड़क को देखा।
हर कोई कहीं पहुँचने की जल्दी में था।
और अचानक उसे लगा कि शायद पूरी दुनिया लगातार चल रही है ताकि उसे रुककर सोचना न पड़े।
उसने आँखें बंद कर लीं।
उसे याद आया — कभी उसे विश्वास था कि जीवन का कोई स्पष्ट उद्देश्य होगा। फिर धीरे-धीरे उद्देश्य टूटते गए। पहले धर्म में, फिर प्रेम में, फिर काम में।
अब सिर्फ़ दिन बचे थे — आते हुए, जाते हुए।
लेकिन अजीब बात यह थी कि इस सबके बावजूद वह जीवित था।
एक हवा का झोंका आया।
उसने पहली बार महसूस किया कि शायद जीवन का अर्थ “मिलना” आवश्यक नहीं है।
शायद जीना ही पर्याप्त है — बिना अंतिम उत्तर के भी।
वह पत्थर से उठा।
सड़क अब भी वैसी ही थी। धूप भी।
लेकिन उसके भीतर कुछ हल्का हो गया था।
जैसे उसने जीवन को समझा नहीं,
सिर्फ़ स्वीकार कर लिया हो।
अल्बेर कामू का संक्षिप्त परिचय
अल्बेर कामू फ्रांसीसी-अल्जीरियाई लेखक, दार्शनिक और पत्रकार थे। उनका जन्म 1913 में अल्जीरिया में हुआ, जो उस समय फ्रांस के अधीन था।
कामू “Absurdism” यानी जीवन की निरर्थकता और मनुष्य की अर्थ-खोज के संघर्ष के दार्शनिक विचार के लिए प्रसिद्ध हैं। उनका मानना था कि जीवन में कोई अंतिम, निश्चित अर्थ नहीं है, फिर भी मनुष्य को ईमानदारी और साहस के साथ जीते रहना चाहिए।
उनकी प्रमुख कृतियों में The Stranger, The Myth of Sisyphus और The Plague शामिल हैं।
1957 में उन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला। उनकी लेखन-शैली सरल, शांत और गहरे अस्तित्वगत प्रश्नों से भरी हुई मानी जाती है।
Mukesh,,,,
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