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Tuesday, 26 May 2026

अपनी-अपनी दिशाओं में खिंचती क्षणिक रेखाएँ।

 फिर एक दिन

मैं शहर के पुराने संग्रहालय में गया।


दीवारों पर टँगे चित्रों के बीच

एक बहुत छोटा-सा स्केच था 

सिर्फ़ कुछ काली रेखाएँ।


न रंग,

न विस्तार,

न कोई प्रसिद्ध नाम।


फिर भी

लोग उसके सामने देर तक खड़े थे।


मैंने पास जाकर देखा।


वह एक आदमी का चेहरा था,

पर चेहरा पूरा नहीं था।

आँख की जगह केवल एक अधूरी वक्र रेखा थी,

होंठों की जगह

जैसे किसी ने थकान खींच दी हो।


मुझे अचानक भय हुआ।


क्योंकि पहली बार समझ में आया

कि मनुष्य को पहचानने के लिए

पूरा चेहरा आवश्यक नहीं होता।


कभी-कभी

सिर्फ़ एक काँपती हुई रेखा

उसके समूचे जीवन को प्रकट कर देती है।


वहाँ खड़े-खड़े

मुझे अपने पिता की लिखावट याद आई।


उनके हस्ताक्षर में

अंतिम अक्षर हमेशा थोड़ा नीचे गिर जाता था।


बचपन में मैंने कभी ध्यान नहीं दिया।

अब समझता हूँ 

वह केवल लिखावट नहीं थी,

वर्षों का अदृश्य बोझ था

जो हर हस्ताक्षर के अंत में

थोड़ा झुक जाता था।


शायद इसी कारण

पुराने पत्र हमें रुला देते हैं।


उनमें शब्दों से अधिक

रेखाएँ बची रहती हैं।


स्याही सूख जाती है,

काग़ज़ पीला पड़ जाता है,

पर किसी की उँगलियों का दबाव

रेखाओं में छिपा रहता है 

जैसे समय स्वयं

धीरे-धीरे काँप रहा हो।


उस शाम संग्रहालय से लौटते हुए

मैंने देखा,

सड़क पर बारिश की पतली धारियाँ

पीली रोशनी में

लगातार तिरछी रेखाएँ बना रही थीं।


पूरा शहर

मानो किसी अदृश्य चित्रकार की स्केचबुक बन गया था।


और हम सब 

चलते हुए लोग,

अपनी-अपनी दिशाओं में खिंचती

क्षणिक रेखाएँ।


मुकेश ,,,,,,,,

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