शहरों में लोग नहीं चलते परछाइयाँ चलती हैं

 शहरों में

लोग नहीं चलते

परछाइयाँ चलती हैं


दीवारों के सीने पर

कुछ थके हुए साए

रोज़ अपनी-अपनी

गुमशुदा सी चाल में

आगे बढ़ जाते हैं


यहाँ कदम नहीं बजते

यहाँ आवाज़ें नहीं गिरतीं

सिर्फ़ लैंपपोस्ट की पीली रोशनी में

कुछ अधूरी हसरतें

रास्तों का रूप धर लेती हैं


खिड़कियों के पीछे

चेहरे नहीं रहते

सिर्फ़ यादों की धुंध में

कुछ नाम

बार-बार बदलते रहते हैं


शहर में

लोग नहीं मिलते

सिर्फ़ वक़्त

एक-दूसरे से टकराकर

बिखर जाता है


और रात

जब सबसे गहरी होती है

तो समझ आता है—

यहाँ जीना नहीं चलता

सिर्फ़ परछाइयाँ चलती हैं


मुकेश ,,,,,,,,,

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