कुछ तन्हाइयाँ इंसान को लिखना सिखा देती हैं,
वरना हर शख़्स कहाँ अपना दर्द अल्फ़ाज़ करता है।
रात जब चुपके से रूह की देहरी पर उतरती है,
दिल अपने ही सन्नाटों से फिर बात करता है।
कोई चेहरा, कोई आवाज़, कोई बिछड़ा हुआ लम्हा,
देर तलक आँखों में धुँआ-सा ठहरा रहता है।
फिर एक अश्क़ काग़ज़ पर गिरकर
नज़्म बन जाता है—
और आदमी समझता है
कि वो सिर्फ़ लिख रहा है।
हालाँकि सच ये है,
तन्हाई उसके भीतर
धीरे-धीरे बोल रही होती है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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