रेखाओं के भीतर एक स्त्री
उसके चेहरे को पहली बार देखने पर जो बात सबसे पहले ध्यान में आती थी, वह उसकी सुंदरता नहीं थी।
बल्कि रेखाएँ थीं।
ऐसा लगता था जैसे किसी अत्यंत धैर्यवान चित्रकार ने उसके चेहरे पर वर्षों तक बैठकर महीन ज्यामितियाँ बनायी हों — कुछ सीधी, कुछ गोल, कुछ अचानक टूटती हुई। उसका चेहरा किसी स्त्री का चेहरा कम और किसी गहरे मनोवैज्ञानिक मानचित्र की तरह अधिक प्रतीत होता था।
उसकी नाक छोटी थी, लगभग अनावश्यक रूप से छोटी, पर उसमें एक विचित्र कठोरता थी। वह चेहरे के बीचोंबीच किसी खड़ी हुई सीधी रेखा की तरह दिखाई देती थी — पतली, नियंत्रित, बिना किसी भावुक वक्रता के। उसे देखकर मुझे हमेशा पुराने यूरोपीय चित्रों की वे स्त्रियाँ याद आती थीं जिनके भीतर भावनाएँ तो बहुत होती थीं, पर वे उन्हें स्वीकार करने के बजाय अनुशासन में बदल देती थीं।
उसकी भौंहें दो अधूरे अर्धवृत्तों की तरह थीं।
वे पूरी तरह गोल नहीं थीं। बीच में कहीं एक सूक्ष्म-सा तनाव आकर उन्हें तोड़ देता था। जैसे किसी ने कोमलता की शुरुआत की हो, पर बीच रास्ते में स्मृति ने हस्तक्षेप कर दिया हो। जब वह चुप रहती, तो वे भौंहें उसके चेहरे पर एक स्थायी प्रश्नचिह्न बना देती थीं।
और उसकी ठुड्डी।
उसमें एक हल्का-सा कोण था — इतना सूक्ष्म कि पहली नज़र में दिखाई न दे, पर एक बार दिख जाए तो फिर अनदेखा न किया जा सके। वही कोण उसके पूरे व्यक्तित्व में फैला हुआ था। उसकी बातों में, उसके बैठने के ढंग में, यहाँ तक कि चाय का कप पकड़ने की मुद्रा में भी। वह कोई भी वाक्य पूरी तरह मुलायम नहीं छोड़ती थी। हर बात के अंत में जैसे एक महीन नोक छिपी रहती थी।
मुझे धीरे-धीरे लगने लगा था कि कुछ लोग अपने शब्दों से नहीं, अपनी आकृतियों से जीते हैं।
रंगों के साथ उसका संबंध भी असामान्य था।
वह प्रायः धूसर, गहरे भूरे, काले या मिट्टी जैसे रंग पहनती थी। पर वे रंग उसके ऊपर उदासी की तरह नहीं, बल्कि किसी आंतरिक चयन की तरह दिखाई देते थे। जैसे उसने संसार के चमकीले रंगों से जान-बूझकर दूरी बना ली हो। उसके कपड़ों में कभी कोई चटकपन नहीं होता था। यहाँ तक कि उसकी साड़ियों की किनारियाँ भी बिना किसी अलंकरण के होतीं — सीधी, शांत, लगभग कठोर।
एक बार मैंने उससे पूछा था —
“तुम्हें हल्के रंग अच्छे नहीं लगते?”
उसने मेरी ओर देखा था। बहुत देर तक।
फिर धीमे स्वर में बोली थी —
“हल्के रंग जल्दी गंदे हो जाते हैं।”
उस उत्तर में जितना कम कहा गया था, उससे कहीं अधिक छिपा हुआ था।
उसकी त्वचा साँवली थी, पर वह उस साँवलेपन को छिपाने की कोई कोशिश नहीं करती थी। बल्कि कभी-कभी लगता था कि वह अपने ही रंग में विलीन हो जाना चाहती है। उसके चेहरे पर हमेशा एक ऐसी थकान रहती थी जो नींद से नहीं जाती। जैसे भीतर कोई लगातार जागता रहता हो।
उससे मेरी पहली मुलाकात एक छोटे-से कला-व्याख्यान में हुई थी। वह पीछे की पंक्ति में बैठी थी और बाकी लोगों की तरह वक्ता को नहीं, दीवार पर पड़ती रोशनी को देख रही थी। उस समय भी मुझे उसके चेहरे की रेखाएँ विचित्र लगी थीं। पर जो बात सबसे अधिक अस्थिर करने वाली थी, वह उसकी दृष्टि थी।
वह सीधे आँखों में नहीं देखती थी।
बल्कि चेहरे के आसपास देखती थी — जैसे वह व्यक्ति नहीं, उसकी आंतरिक संरचना पढ़ रही हो।
बाद में जब हम बाहर निकले, तो हल्की बारिश हो रही थी। उसने छाता नहीं खोला। बस चलते हुए बोली —
“बारिश में शहर की रेखाएँ धुँधली हो जाती हैं। तब लोग थोड़े कम क्रूर लगते हैं।”
मैं उस वाक्य को तुरंत समझ नहीं पाया था।
कुछ दिनों बाद उसने अचानक मुझे अपने घर आने के लिए कहा।
उसका घर शहर के पुराने हिस्से में था। तीसरी मंज़िल पर। सीढ़ियाँ सँकरी थीं और उन पर पुराने समय की सीलन जमी हुई थी। ऊपर पहुँचते-पहुँचते मुझे हल्की साँस चढ़ने लगी थी।
उसने दरवाज़ा खोला।
उस दिन उसने गहरे भूरे रंग का ढीला कुर्ता पहन रखा था। बिना किसी गहने के। बाल पीछे बँधे हुए थे। कमरे के भीतर हल्की कॉफी और पुरानी किताबों की मिली-जुली गंध थी।
उसके घर में प्रवेश करते ही जो बात सबसे पहले ध्यान खींचती थी, वह वस्तुओं का आकार था।
या तो सब कुछ अत्यधिक गोल था,
या फिर अजीब ढंग से कोणीय।
बैठक में रखी गोल मेज़ इतनी चिकनी थी कि उस पर हाथ फेरने का मन होता था। उसके बगल में रखी एक त्रिकोणाकार लकड़ी की शेल्फ़ कमरे में लगभग असंगत लगती थी। कुशन गोल थे, पर दीवार पर लगी धातु की घड़ी तीखे कोणों वाली थी। यहाँ तक कि कमरे में रखे पौधों के गमले भी या तो पूर्ण वृत्ताकार थे या बिल्कुल नुकीले किनारों वाले।
धीरे-धीरे समझ में आने लगा कि उसका घर उसकी ही मनःस्थिति का विस्तार था।
ऊपर से ओढ़ी हुई गोलाई।
भीतर छिपे हुए कोण।
उसका व्यवहार विनम्र था, पर उसमें गर्मजोशी नहीं थी। वह मुस्कुराती थी, पर मुस्कान कभी पूरी नहीं खुलती थी। जैसे वह हर क्षण स्वयं को थोड़ा रोक लेती हो।
जब वह चाय बना रही थी, मैं रसोई के दरवाज़े के पास खड़ा उसे देखता रहा।
उसकी हर हरकत नपी-तुली थी। कप रखते समय भी आवाज़ नहीं होती थी। उसने चीनी डालते हुए पूछा —
“आप लोगों को जल्दी पढ़ लेते हैं?”
“शायद नहीं,” मैंने कहा।
वह हल्का-सा मुस्कुरायी।
“अच्छा है। जो लोग जल्दी पढ़ लेते हैं, वे जल्दी ऊब भी जाते हैं।”
फिर कुछ देर कमरे में केवल चम्मच की धीमी आवाज़ सुनाई देती रही।
मुझे अचानक लगा —
वह अब भी मुझे तौल रही है।
सिर्फ़ मेरे शब्दों को नहीं।
मेरे बैठने के ढंग को।
मेरे हाथों की गति को।
मेरे कप पकड़ने की सावधानी को।
यहाँ तक कि मेरे मौन को भी।
और शायद उसी क्षण मुझे पहली बार उसके भीतर की वास्तविक उदासी दिखाई दी।
वह दुखी स्त्रियों जैसी उदासी नहीं थी।
वह अधिक जटिल थी।
जैसे किसी ने जीवन में बहुत पहले यह तय कर लिया हो कि संसार से पूरी तरह प्रेम नहीं करना चाहिए — क्योंकि प्रेम अंततः मनुष्य को असावधान बना देता है।
उस शाम लौटते समय मुझे उसका चेहरा बार-बार याद आता रहा।
उसकी सीधी नाक।
अधूरे वृत्त जैसी भौंहें।
ठुड्डी का छोटा-सा कोण।
गहरे रंगों का चयन।
और वे कमरे की वस्तुएँ — आधी गोल, आधी नुकीली।
मानो वह स्त्री नहीं,
रेखाओं और रंगों में लिखा हुआ कोई लंबा मनोवैज्ञानिक उपन्यास हो।
मुकेश ,,,,,,,
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