कुर्वन्नेवेह
कर्माणि” — ईशावास्योपनिषद् के द्वितीय मन्त्र का कर्म, ज्ञान और जीवन-दर्शन
शाङ्करभाष्य,
वेदान्त, कर्मनिष्ठा एवं तुलनात्मक दार्शनिक अध्ययन
ईशावास्योपनिषद्
— द्वितीय मन्त्र (मूल संस्कृत)
कुर्वन्नेवेह
कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥ २॥
मन्त्र
का हिन्दी अर्थ
इस संसार में कर्म करते
हुए ही मनुष्य को
सौ वर्ष तक जीने
की इच्छा करनी चाहिए।
इस प्रकार कर्म करते हुए
जीने में ही तेरे
लिए मार्ग है; इसके अतिरिक्त
दूसरा कोई उपाय नहीं
है, जिससे कर्म मनुष्य को
बाँध न सके।
शङ्करभाष्य
(संस्कृत — यथावत्)
अथैतस्यामात्मविदः
पुत्रैषणात्रयसंन्यासेनात्मज्ञाननिष्ठतयात्मा
रक्षितव्य इत्येष वेदार्थः।
अथेतरस्याऽनात्मज्ञतयात्मग्रहणायाशक्तस्येदमुपदिशति
मन्त्रः — “कुर्वन्नेवेति”।
कुर्वन्नेव इह निर्वर्तयन्नेव कर्माण्यग्निहोत्रादीनि।
जिजीविषेत् जीवितुमिच्छेच्छतं शतसंख्याकाः समाः संवत्सरान्।
तावद्धि पुरुषस्य परमायुर्निरूपितम्।
तथाच प्राप्तानुवादेन “शतं समाः” इत्युक्त्वा
“तत्कुर्वन्नेव कर्माणि” इत्येतद्विधीयते।
एवमेवंप्रकारेण त्वयि जिजीविषति नरे, नान्यथेतोऽस्ति प्रकारान्तरं
येन प्रकारेणाशुभं कर्म न लिप्यते।
कर्मणा न लिप्यत इत्यर्थः।
अतः शास्त्रविहितानि कर्माण्यग्निहोत्रादीनि कुर्वन्नेव जिजीविषेत्।
कथं पुनरिदमवगम्यते? पूर्वेण मन्त्रेण संन्यासिनो ज्ञाननिष्ठोक्ता, द्वितीयेन तदशक्तस्य कर्मनिष्ठेति।
उच्यते — ज्ञानकर्मणोर्विरोधः पर्वतवदकम्प्यः।
यथोक्तं — “ईशावास्यमिदं सर्वम्”, “तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा
मा गृधः कस्यस्विद्धनम्” इति
च।
“न जीविते मरणे वा गृधिं
कुर्यात्, अरण्यमीयात्” इति च।
ततः “न पुनरियात्” इति
संन्यासशासनात्।
उभयोः फलभेदं च वक्ष्यति।
इमौ द्वावेव पन्थानौ — प्रवृत्तिलक्षणो धर्मः, निवृत्तिलक्षणश्च।
तयोः संन्यासपथ एवातिरेचयति।
“न्यास एवात्यरेचयत्” इति च तैत्तिरीयके।
“द्वाविमावथ पन्थानौ यत्र वेदाः प्रतिष्ठिताः
— प्रवृत्तिलक्षणो धर्मो निवृत्तिश्च विभावितः” इत्यादि।॥२॥
शङ्करभाष्य
का हिन्दी अनुवाद
प्रथम
मन्त्र में यह वेदार्थ
बताया गया कि आत्मज्ञानी
पुरुष को पुत्रेषणा, वित्तेषणा
और लोकेषणा — इन तीनों एषणाओं
का संन्यास करके आत्मज्ञान में
स्थित रहकर आत्मा की
रक्षा करनी चाहिए।
अब जो आत्मज्ञानी नहीं
है और आत्मतत्त्व को
ग्रहण करने में असमर्थ
है, उसके लिए यह
मन्त्र उपदेश करता है — “कुर्वन्नेव”।
अर्थात्
इस संसार में अग्निहोत्र आदि
कर्मों का अनुष्ठान करते
हुए ही जीना चाहिए।
मनुष्य
को सौ वर्षों तक
जीने की इच्छा करनी
चाहिए, क्योंकि इतना ही मनुष्य
का परम आयु-मान
माना गया है।
यहाँ
“शतं समाः” केवल आयु का
उल्लेख है; मुख्य विधि
यह है कि कर्म
करते हुए ही जीवन
बिताना चाहिए।
इस प्रकार कर्म करते हुए
जीने वाले मनुष्य के
लिए कर्मबन्धन से बचने का
अन्य कोई उपाय नहीं
है।
अर्थात्
कर्म मनुष्य को बाँधता नहीं।
इसलिए
शास्त्रविहित अग्निहोत्र आदि कर्म करते
हुए ही जीने की
इच्छा करनी चाहिए।
यह कैसे समझा जाए
कि पहले मन्त्र में
ज्ञाननिष्ठा और यहाँ कर्मनिष्ठा
कही गई है?
उत्तर
है — ज्ञान और कर्म का
परस्पर विरोध पर्वत के समान अचल
है।
पहले
मन्त्र में कहा गया—
“ईशावास्यमिदं
सर्वम्”
“तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा”
“मा गृधः”
अर्थात्
त्याग और आत्मैक्य का
उपदेश दिया गया। और अन्य
श्रुतियों में कहा गया—
“न जीविते मरणे वा गृधिं
कुर्यात्, अरण्यमीयात्” अर्थात् जीवन और मृत्यु
में आसक्ति न रखकर वन
को चला जाए।
इसलिए
संन्यास का विधान स्पष्ट
है।
दो मार्ग हैं—
- प्रवृत्तिमार्ग (कर्म)
- निवृत्तिमार्ग (संन्यास)
इनमें
संन्यासमार्ग श्रेष्ठ कहा गया है।
तैत्तिरीय श्रुति
में भी कहा गया—
“न्यास एवात्यरेचयत्” अर्थात् संन्यास ही श्रेष्ठ है।
द्वितीय
मन्त्र का दार्शनिक स्थान
ईशावास्योपनिषद्
का प्रथम मन्त्र जहाँ आत्मज्ञान और
संन्यास का प्रतिपादक है,
वहीं द्वितीय मन्त्र कर्म और प्रवृत्ति
का विधान करता है।
यहाँ
उपनिषद् मानवता के दो स्तर
स्वीकार करता है—
- आत्मज्ञानी — जिसके लिए संन्यास
- अनात्मज्ञ — जिसके लिए कर्मयोग
यह अत्यन्त सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक विभाजन
है।
“कुर्वन्नेव”
— कर्म की अनिवार्यता
“कुर्वन्नेव”
शब्द में “एव” का
विशेष महत्त्व है, अर्थात्—
- कर्म करते हुए ही
- निष्क्रियता नहीं
- पलायन नहीं
शङ्कराचार्य
के अनुसार अज्ञानावस्था में कर्म अनिवार्य
है, क्योंकि मनुष्य देहाभिमान से युक्त है।
“जिजीविषेत्
शतं समाः” — जीवन की वैदिक अवधारणा
यहाँ
उपनिषद् जीवन-विरोधी नहीं
है।
यह कहता है— जीओ,
किन्तु धर्मपूर्वक। कर्म करो, किन्तु आसक्ति से नहीं।
यह वैदिक जीवनदृष्टि है जहाँ संसार
त्याज्य नहीं, साधना-क्षेत्र है।
कर्म
और ज्ञान का विरोध
शङ्कराचार्य
का अत्यन्त प्रसिद्ध सिद्धान्त यहाँ प्रकट होता
है— “ज्ञानकर्मणोर्विरोधः पर्वतवदकम्प्यः।” अर्थात् ज्ञान और कर्म का
विरोध पर्वत के समान अचल
है।
क्यों?
कर्म का
आधार - कर्ता
/कर्म /करण /फल
ज्ञान का
आधार – अद्वैत/अकर्ता आत्मा / अभेद
अतः
जहाँ अद्वैत का अनुभव है,
वहाँ कर्म की प्रेरणा
नहीं रहती।
प्रवृत्ति और निवृत्ति
उपनिषद्
दो मार्ग स्वीकार करता है—
(क) प्रवृत्तिमार्ग - गृहस्थ , यज्ञ ,अग्निहोत्र ,समाजधर्म ,कर्मयोग
(ख) निवृत्तिमार्ग - संन्यास
,आत्मज्ञान ,वैराग्य ,ब्रह्मनिष्ठा
शङ्कराचार्य
निवृत्ति को श्रेष्ठ मानते
हैं।
“न
कर्म लिप्यते” — निष्काम कर्म का सिद्धान्त
यहाँ
कर्म का त्याग नहीं,
कर्मफलासक्ति का त्याग अपेक्षित
है।
यदि
कर्म— अहंकार से रहित हो,
फलासक्ति से रहित हो,
ईश्वरार्पणबुद्धि से हो,
तो कर्म बन्धन नहीं
बनता।
यही
सिद्धान्त आगे Bhagavad Gita में कर्मयोग के
रूप में विकसित होता
है।
वैज्ञानिक एवं मनोवैज्ञानिक व्याख्या
आधुनिक
मनोविज्ञान के अनुसार निष्क्रियता
मानसिक विक्षेप उत्पन्न करती है।
मानव-मस्तिष्क स्वभावतः कर्मशील है।
अतः कर्म का दमन
नहीं, बल्कि परिष्कार आवश्यक है।
आधुनिक
दृष्टि से “निष्काम कर्म”
- तनाव कम करता है
- अहंकार घटाता है
- उद्देश्यबोध देता है
- मानसिक संतुलन बढ़ाता है
भारतीय
दर्शनों से तुलनात्मक अध्ययन
(क)
अद्वैत वेदान्त
Adi Shankaracharya के
अनुसार—
- कर्म अज्ञानावस्था के लिए है।
- ज्ञान होने पर कर्म का परित्याग होता है।
(ख)
विशिष्टाद्वैत
Ramanujacharya कर्म
और भक्ति दोनों को स्वीकार करते
हैं।
उनके
अनुसार कर्म ईश्वर-सेवा
है, त्याज्य नहीं।
(ग)
द्वैत
Madhvacharya के
अनुसार जीव सदा ईश्वर
से भिन्न है; अतः ईश्वरभक्ति
और कर्म दोनों शाश्वत
हैं।
(घ)
कर्ममीमांसा
Jaimini कर्म
को ही प्रधान मानते
हैं।
उनके
लिए वेद का उद्देश्य
यज्ञकर्म है, न कि
ब्रह्मज्ञान।
शङ्कराचार्य
इसी मत का खण्डन
करते हैं।
(ङ)
सांख्य एवं योग
Patanjali का
योग “कर्मशुद्धि” और “चित्तवृत्ति निरोध”
की ओर ले जाता
है।
यह निष्काम कर्म के सिद्धान्त
से साम्य रखता है।
पाश्चात्य
दर्शन से तुलना
(क)
Immanuel Kant
कान्त
का “Duty for Duty’s
sake” निष्काम कर्म के निकट
है।
कर्म
फल के लिए नहीं,
कर्तव्यबोध से होना चाहिए।
(ख)
Soren Kierkegaard
किर्केगार्द
ने आन्तरिक आस्था और व्यक्तिगत उत्तरदायित्व
पर बल दिया।
उनकी
“Leap of Faith” कर्म और आत्मनिष्ठा के
बीच सम्बन्ध स्थापित करती है।
(ग)
Albert Camus
कामू
का “Absurd Hero” निरर्थकता के बीच कर्म
करता रहता है।
किन्तु
उपनिषद् कर्म को आध्यात्मिक
अर्थ प्रदान करता है।
(घ)
Friedrich Nietzsche
नीत्शे
का “Will to Power” कर्मप्रधानता का दर्शन है,
किन्तु उसमें त्याग और निष्कामता का
अभाव है।
मुख्य
पदों की दार्शनिक व्याख्या
“कर्माणि”
केवल
लौकिक कार्य नहीं, बल्कि वैदिक यज्ञकर्म।
“जिजीविषेत्”
जीवन
के प्रति सकारात्मक वैदिक दृष्टिकोण।
“लिप्यते”
कर्मफल-बन्धन में फँसना।
“एव”
कर्म
की अनिवार्यता का बोधक।
“नान्यथेतोऽस्ति”
अज्ञानावस्था
में कर्म से बचने
का अन्य मार्ग नहीं।
निष्कर्ष
ईशावास्योपनिषद्
का द्वितीय मन्त्र मानव जीवन की
द्विस्तरीय साधना को प्रकट करता
है।
- आत्मज्ञानी के लिए — संन्यास
- साधक के लिए — निष्काम कर्म
शङ्कराचार्य
ने स्पष्ट किया कि ज्ञान
और कर्म का अन्तिम
समन्वय नहीं, बल्कि क्रम है—
कर्म
→ चित्तशुद्धि → ज्ञान → मोक्ष
यह मन्त्र जीवन से पलायन
नहीं सिखाता, बल्कि कर्म को साधना
बना देता है।
इस प्रकार ईशावास्योपनिषद् भारतीय दर्शन में कर्म और
ज्ञान के मध्य सूक्ष्म
संतुलन की अद्वितीय स्थापना
करता है।
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