आधुनिक चित्रकला की बारीकियाँ : विशेषतः अमूर्त कला (Abstract Art) का सौन्दर्यशास्त्र

आधुनिक चित्रकला की बारीकियाँ : विशेषतः अमूर्त कला (Abstract Art) का सौन्दर्यशास्त्र

जब कोई व्यक्ति पहली बार किसी अमूर्त (Abstract) चित्र के सामने खड़ा होता है, तो उसके मन में प्रायः एक प्रश्न उठता है— "इसमें बना क्या है?"

यही प्रश्न आधुनिक अमूर्त कला और पारम्परिक चित्रकला के बीच का सबसे बड़ा अन्तर भी है।

पारम्परिक चित्रकला में दर्शक किसी वस्तु, व्यक्ति, दृश्य या घटना को पहचानने का प्रयास करता है। वह देखना चाहता है कि चित्रकार ने क्या चित्रित किया है। किन्तु अमूर्त कला में प्रश्न बदल जाता है। वहाँ कलाकार यह नहीं पूछता कि "तुम क्या देख रहे हो?", बल्कि यह पूछता है— "तुम क्या अनुभव कर रहे हो?"

यहीं से आधुनिक चित्रकला का नया अध्याय आरम्भ होता है।

आधुनिक चित्रकला का जन्म

उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त तक पश्चिमी चित्रकला का मुख्य उद्देश्य यथार्थ का दृश्य पुनर्निर्माण था।

फिर फोटोग्राफी का आविष्कार हुआ। अब यथार्थ को हू-ब-हू दिखाने का कार्य कैमरा अधिक कुशलता से करने लगा।

चित्रकारों के सामने प्रश्न था— अब कला क्या करेगी?

उत्तर था— कला दृश्य संसार की नकल नहीं करेगी; वह अनुभव, चेतना, भावना और अन्तर्जगत की खोज करेगी।

यहीं से आधुनिक कला और आगे चलकर अमूर्त कला का जन्म हुआ।

अमूर्त कला क्या है?

अमूर्त कला का अर्थ यह नहीं कि चित्र में कुछ भी न हो।

बल्कि इसका अर्थ है कि चित्र का विषय कोई पहचानी जा सकने वाली वस्तु नहीं, बल्कि— ऊर्जा,भावना,लय,गति,स्मृति,समय,चेतना,या कोई आन्तरिक अनुभव हो सकता है।

अमूर्त कला वस्तु से अधिक अनुभव को चित्रित करती है।

अमूर्त कला की सबसे बड़ी भूल-समझ

बहुत से लोग सोचते हैं— "जो चित्र समझ में न आए वही अमूर्त कला है।" यह धारणा गलत है।

अच्छी अमूर्त कला अत्यन्त अनुशासित होती है।

उसमें— संरचना होती है,संतुलन होता है,दृश्य-लय होती है,रंग-व्यवस्था होती है,और एक आन्तरिक तर्क भी होता है।

अमूर्त कला अराजकता नहीं है।

वह दृश्य संगीत (Visual Music) है।

अमूर्त कला की पहली बारीकी : संरचना (Composition)

चित्र में क्या बनाया गया है, इससे पहले महत्त्वपूर्ण है—

चित्र में क्या कहाँ रखा गया है।

एक उत्कृष्ट अमूर्त चित्र में— रिक्त स्थान,रंगों का भार,आकृतियों की दिशा,दृश्य संतुलन,सभी अत्यन्त सोच-समझकर व्यवस्थित किए जाते हैं।

दर्शक को यह सहज लगता है, पर कलाकार इसके लिए वर्षों अभ्यास करता है।

दूसरी बारीकी : दृश्य-लय (Visual Rhythm)

जिस प्रकार संगीत में ताल होती है, उसी प्रकार चित्र में दृश्य-लय होती है।

रेखाओं की पुनरावृत्ति, आकृतियों की गति,रंगों का प्रवाह—ये सब मिलकर चित्र में लय उत्पन्न करते हैं।

इसीलिए अनेक कला-इतिहासकार अमूर्त चित्रकला को "मौन संगीत" कहते हैं।

तीसरी बारीकी : रंगों का मनोविज्ञान

अमूर्त कला में रंग वस्तुओं का प्रतिनिधित्व नहीं करते।

वे भावनाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। उदाहरणार्थ—

  • लाल ऊर्जा, संघर्ष या आवेग का संकेत दे सकता है।
  • नीला गहराई और अनन्तता का।
  • पीला प्रकाश और जागृति का।
  • काला रहस्य या शून्यता का।

किन्तु यह कोई स्थिर नियम नहीं।

महान कलाकार रंगों को अपने निजी अनुभव के अनुसार अर्थ देते हैं।

चौथी बारीकी : रिक्तता का उपयोग

अमूर्त कला में जो दिखाई देता है उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना कि जो दिखाई नहीं देता।

रिक्त स्थान (Negative Space) चित्र का सक्रिय हिस्सा होता है।

कभी-कभी चित्र का सबसे शक्तिशाली भाग वही होता है जहाँ कुछ नहीं बनाया गया।

यह सिद्धान्त भारतीय दर्शन के "शून्य" और जापानी सौन्दर्यशास्त्र के "मा" की याद दिलाता है।

पाँचवीं बारीकी : सतह (Texture)

आधुनिक कलाकार केवल रंगों से काम नहीं करता। 

वह सतह के साथ भी प्रयोग करता है।

कभी रंग मोटी परतों में लगाए जाते हैं।

कभी खुरचे जाते हैं।

कभी कैनवास स्वयं चित्र का हिस्सा बन जाता है।

इससे चित्र देखने का अनुभव अधिक स्पर्शात्मक हो जाता है।

अमूर्त कला और भारतीय परम्परा 

यह एक रोचक तथ्य है कि भारतीय कला में अमूर्तता का इतिहास आधुनिक पश्चिमी कला से कहीं पुराना है।

बिन्दु - एक बिन्दु सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का प्रतीक।

मंडल - ब्रह्माण्डीय संरचना का अमूर्त चित्र।

यंत्र - ध्यान और चेतना की ज्यामिति।

ओंकार - ध्वनि का दृश्य प्रतीक।

इन सबमें अमूर्तता का गहरा तत्व उपस्थित है।

अमूर्त कला को कैसे देखें?

अमूर्त चित्र के सामने खड़े होकर यह मत पूछिए—

"यह क्या है?"

इसके स्थान पर पूछिए—

  • यह मुझे क्या महसूस करा रहा है?
  • मेरी दृष्टि कहाँ जा रही है?
  • रंग मुझे किस भाव में ले जा रहे हैं?
  • चित्र में गति है या मौन?
  • तनाव है या संतुलन?

अमूर्त कला को समझने से अधिक अनुभव करना आवश्यक है।

क्या हर कोई अमूर्त कला को समझ सकता है? हाँ।

किन्तु उसके लिए अभ्यास चाहिए।

जिस प्रकार शास्त्रीय संगीत पहली बार में सबको नहीं खुलता, उसी प्रकार अमूर्त कला भी धीरे-धीरे अपना रहस्य प्रकट करती है।

समस्या कला में नहीं, हमारी देखने की आदतों में होती है।

हम वस्तुओं को पहचानने के अभ्यस्त हैं।

अमूर्त कला हमें अनुभव करना सिखाती है।

अमूर्त कला की सबसे बड़ी कसौटी

एक महत्वपूर्ण प्रश्न है— अच्छी अमूर्त कला और साधारण रंग-बिखराव में अन्तर कैसे करें?

उत्तर है— क्या चित्र में एक आन्तरिक आवश्यकता (Inner Necessity) दिखाई देती है?

क्या उसमें लय, संतुलन और ऊर्जा है? -क्या वह बार-बार देखने पर नए अर्थ खोलता है?

यदि हाँ, तो वह कला है।

यदि नहीं, तो वह केवल रंगों का प्रयोग हो सकता है।

भारतीय कला-जगत के लिए चुनौती

भारत में आज भी अमूर्त कला को लेकर दो अतियाँ दिखाई देती हैं—

एक पक्ष उसे समझे बिना अस्वीकार कर देता है।

दूसरा पक्ष उसे समझे बिना स्वीकार कर लेता है।

दोनों स्थितियाँ समस्या हैं।

अमूर्त कला की वास्तविक समझ उसके सौन्दर्यशास्त्र, संरचना, रंग-चिन्तन और दार्शनिक पृष्ठभूमि के अध्ययन से ही विकसित हो सकती है।

आधुनिक अमूर्त चित्रकला वस्तुओं का चित्रण नहीं करती; वह अनुभवों, भावों, ऊर्जाओं और चेतना की अवस्थाओं को दृश्य रूप देने का प्रयास करती है। उसकी बारीकियाँ संरचना, दृश्य-लय, रंग-मनोविज्ञान, रिक्तता, सतह और प्रतीकात्मक ऊर्जा में निहित हैं। उसे समझने के लिए केवल आँखें पर्याप्त नहीं; संवेदनशीलता, धैर्य और आन्तरिक सहभागिता भी आवश्यक है।

अंततः अमूर्त कला हमें यह सिखाती है कि—

सत्य हमेशा किसी आकृति में नहीं मिलता। कभी-कभी वह रंगों के बीच की खामोशी में, रेखाओं की गति में और रिक्त स्थानों की मौन उपस्थिति में छिपा होता है।


 मुकेश ,,,,

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