मैंने कई बार खुद को समझाने की कोशिश की
मैंने कई बार खुद को समझाने की कोशिश की
कि सब ठीक है
आवाज़ भी सामान्य थी
चेहरा भी शांत था
शब्द भी संतुलित थे
मगर भीतर
कुछ टूटता ही रहा
जैसे किसी बंद कमरे में
कोई कुर्सी धीरे-धीरे खाली होती जा रही हो
और किसी को पता भी न चले
कि वहाँ कोई बैठा था।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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