वैदिक साहित्य में चित्रकला के तत्त्व
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वैदिक साहित्य में चित्रकला के तत्त्व
भारतीय संस्कृति में चित्रकला को केवल मनोरंजन अथवा सौन्दर्य-वर्धन का साधन नहीं माना गया, बल्कि उसे दर्शन, आध्यात्मिकता, प्रतीक-चिन्तन और सांस्कृतिक स्मृति का वाहक समझा गया है। सामान्यतः यह धारणा बनाई जाती है कि चित्रकला का व्यवस्थित विकास उत्तरवैदिक अथवा शास्त्रीय काल में हुआ, जबकि वैदिक साहित्य में चित्रकला का प्रत्यक्ष उल्लेख अपेक्षाकृत कम मिलता है। परन्तु यदि वेदों, ब्राह्मण-ग्रन्थों, आरण्यकों और उपनिषदों का गहन अध्ययन किया जाए तो ज्ञात होता है कि चित्रकला के मूल तत्त्व—रंग, रेखा, रूप, प्रकाश, प्रतीक, अनुपात, कल्पना और दृश्य-सृष्टि—वैदिक साहित्य में अत्यन्त गहराई से विद्यमान हैं।
वास्तव में वैदिक ऋषि चित्रकार नहीं थे, किन्तु उनकी दृष्टि चित्रात्मक (Pictorial) थी। वे शब्दों से चित्र बनाते थे। इसीलिए वैदिक साहित्य को विश्व की महानतम "शब्द-चित्रशाला" भी कहा जा सकता है।
वैदिक दृष्टि में सौन्दर्य और रूप
वेदों में "रूप" (Form) और "श्री" (Beauty) की अवधारणा बार-बार मिलती है। ऋषि प्रकृति के विविध रूपों का ऐसा वर्णन करते हैं कि वे पाठक के मन में सजीव चित्र निर्मित कर देते हैं।
ऋग्वेद में उषा (प्रभात) का वर्णन एक युवा सुन्दरी के रूप में किया गया है— "उषा दिवो दुहिता"
उषा केवल प्राकृतिक घटना नहीं रह जाती; वह रंग, प्रकाश और सौन्दर्य का जीवंत चित्र बन जाती है।
यह चित्रात्मकता आगे चलकर भारतीय चित्रकला की आधारभूमि बनी।
रंग-बोध : चित्रकला का प्रथम तत्त्व
चित्रकला का सबसे महत्वपूर्ण तत्त्व रंग है। वैदिक साहित्य में रंगों का उल्लेख अत्यन्त समृद्ध रूप में मिलता है।
1. अरुण (लालिमा)
उषा को अरुण वर्णों से युक्त बताया गया है। सूर्य के उदयकाल की लालिमा ऋषियों को विशेष रूप से आकर्षित करती थी।
यह लाल रंग केवल दृश्य अनुभव नहीं बल्कि— जागरण,ऊर्जा,जीवन,और नवसृष्टि का प्रतीक भी है।
2. हिरण्य (स्वर्णिम रंग)
वेदों में "हिरण्य" शब्द अत्यन्त बार आता है। हिरण्यगर्भ,हिरण्यपाणि,हिरण्यकेश
आदि प्रयोग केवल स्वर्ण का संकेत नहीं, बल्कि प्रकाश और दिव्यता के रंग-बोध को व्यक्त करते हैं।
स्वर्णिम रंग बाद की भारतीय चित्रकला में दिव्यता का प्रमुख रंग बन गया।
3. शुक्ल (श्वेत)
श्वेत रंग पवित्रता, सत्य और प्रकाश का प्रतीक है।
यज्ञ, अग्नि, सोम तथा देवत्व के अनेक वर्णनों में श्वेतता का प्रयोग मिलता है।
4. कृष्ण और श्याम
वेदों में अंधकार, रात्रि, मेघ और रहस्य के लिए कृष्ण अथवा श्याम वर्ण का प्रयोग मिलता है।
यह नकारात्मकता का रंग मात्र नहीं बल्कि सृष्टि की गर्भावस्था और संभावनाओं का भी प्रतीक है।
प्रकाश और छाया का बोध
चित्रकला का दूसरा महत्वपूर्ण तत्त्व प्रकाश है।
ऋग्वेद का एक बड़ा भाग प्रकाश और अंधकार के संघर्ष का काव्य है।
सूर्य, अग्नि और उषा को बार-बार चित्रित किया गया है।
यहाँ ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि ऋषि प्रकाश को केवल भौतिक घटना नहीं मानते; वह ज्ञान और चेतना का भी प्रतीक है।
चित्रकला में प्रकाश का जो आध्यात्मिक प्रयोग भारतीय परम्परा में मिलता है, उसकी जड़ें वैदिक चिन्तन में दिखाई देती हैं।
रेखा और संरचना का वैदिक आधार
यद्यपि वेदों में चित्रांकन की तकनीकी चर्चा नहीं है, परन्तु यज्ञ-वेदियों, मंडलों और ज्यामितीय विन्यासों का विस्तृत वर्णन मिलता है।
विशेषकर Shulba Sutras में— वर्ग,वृत्त,आयत,त्रिभुज, तथा जटिल ज्यामितीय संरचनाओं का उल्लेख मिलता है।
ये केवल गणितीय आकृतियाँ नहीं थीं; वे धार्मिक और सौन्दर्यपरक संरचनाएँ भी थीं।
भारतीय चित्रकला में संरचना (Composition) की जो परम्परा विकसित हुई, उसका एक आधार यह वैदिक ज्यामिति भी है।
प्रकृति : वैदिक चित्रकला की प्रेरणा
वेदों का अधिकांश काव्य प्रकृति से प्रेरित है। ऋषियों ने वर्णन किया—
- उषा का लाल आकाश,
- सूर्य का स्वर्णिम रथ,
- मेघों का समूह,
- विद्युत की चमक,
- नदियों का प्रवाह,
- वनस्पतियों की हरितिमा।
ये सभी वर्णन इतने दृश्यात्मक हैं कि पाठक के मन में चित्र उभरने लगते हैं।
वास्तव में वैदिक ऋषि प्रकृति के प्रथम महान चित्रकार थे, जिन्होंने तूलिका के स्थान पर भाषा का उपयोग किया।
प्रतीकवाद : अमूर्त चित्रकला का वैदिक आधार
आधुनिक अमूर्त कला का एक प्रमुख तत्त्व प्रतीकवाद है।वैदिक साहित्य में प्रतीकों की अद्भुत परम्परा मिलती है।
उदाहरणतः—
अग्नि - अग्नि केवल अग्नि नहीं है। वह— ज्ञान,यज्ञ,ऊर्जा,रूपांतरण,और देव-संपर्कका प्रतीक है।
सूर्य - सूर्य केवल खगोलीय पिण्ड नहीं। वह चेतना, दृष्टि और आत्मप्रकाश का प्रतीक है।
अश्व - अश्व शक्ति और गतिशीलता का प्रतीक है।
कमल - यद्यपि कमल का व्यापक विकास उत्तरवैदिक साहित्य में मिलता है, उसका बीज वैदिक प्रतीक-चिन्तन में निहित है।
यह प्रतीकात्मकता भारतीय चित्रकला की आत्मा बन गई।
उपनिषदों में दृश्य कल्पना
उपनिषदों को सामान्यतः दार्शनिक ग्रन्थ माना जाता है, किन्तु उनमें अद्भुत दृश्यात्मकता है।
छान्दोग्य उपनिषद में ब्रह्माण्डीय कल्पनाएँ, कठोपनिषद में रथ-रूपक, मुण्डकोपनिषद में दो पक्षियों का रूपक—ये सब चित्रात्मक संरचनाएँ हैं।
विशेषतः मुण्डकोपनिषद का प्रसिद्ध रूपक— "एक वृक्ष पर बैठे दो पक्षी"
भारतीय चित्रकला के लिए एक उत्कृष्ट दृश्य-प्रतीक प्रस्तुत करता है।
एक पक्षी जीव है, दूसरा परमात्मा।
यह वस्तुतः एक आध्यात्मिक चित्र है।
रस और भाव : चित्रकला का मनोवैज्ञानिक पक्ष
यद्यपि रस-सिद्धान्त का व्यवस्थित विकास बाद में हुआ, उसकी मूल भावभूमि वैदिक साहित्य में दिखाई देती है।
वेदों में— विस्मय,श्रद्धा,करुणा, उत्साह,शान्ति जैसी भावनाएँ प्रचुर मात्रा में हैं।
चित्रकला का उद्देश्य भी भावोत्पत्ति है।
इस दृष्टि से वैदिक साहित्य भारतीय सौन्दर्यशास्त्र की आधारशिला सिद्ध होता है।
वैदिक यज्ञ और दृश्य कला
यज्ञ केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं था। वह एक दृश्य-रचना (Visual Composition) भी था।
यज्ञ में— वेदी की संरचना,अग्नि की स्थिति,रंगीन सामग्री,पुष्प,वस्त्र,ध्वज,और मंडल सभी मिलकर एक सौन्दर्यात्मक वातावरण निर्मित करते थे।
कुछ विद्वानों ने यज्ञ को भारत की प्राचीनतम "समेकित कला" (Total Art Form) कहा है।
वैदिक साहित्य और आधुनिक चित्रकला
आधुनिक कलाकारों ने भी वैदिक प्रतीकों से प्रेरणा ली है।
S. H. Raza का प्रसिद्ध "बिन्दु" भारतीय आध्यात्मिक परम्परा और वैदिक ब्रह्माण्ड-दृष्टि से प्रभावित माना जाता है।
उनके चित्रों में रंग, मंडल और ज्यामिति वैदिक प्रतीकवाद की आधुनिक अभिव्यक्ति प्रतीत होते हैं।
वैदिक साहित्य में चित्रकला का कोई व्यवस्थित शास्त्र उपलब्ध नहीं है, किन्तु चित्रकला के लगभग सभी मूल तत्त्व वहाँ बीजरूप में उपस्थित हैं। रंग-बोध, प्रकाश-दर्शन, प्रकृति-चित्रण, ज्यामितीय संरचना, प्रतीकवाद, दृश्यात्मक कल्पना, भाव-सृष्टि और आध्यात्मिक सौन्दर्य—ये सभी तत्त्व वैदिक साहित्य में गहराई से निहित हैं।
अतः यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि भारतीय चित्रकला की जड़ें केवल शिल्प-परम्परा में नहीं, बल्कि वैदिक ऋषियों की उस विराट दृष्टि में हैं जिसने सम्पूर्ण जगत को एक जीवित चित्र के रूप में देखा। वेदों के ऋषि तूलिका से चित्र नहीं बनाते थे, किन्तु उनके मंत्र ऐसे शब्द-चित्र रचते हैं जिनकी रंग-छटा आज भी भारतीय कला और संस्कृति को आलोकित कर रही है।
मुकेश ,,,,,,,
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