रिक्तकाल का साक्ष्य

 रिक्तकाल का साक्ष्य

उसके जाने की ख़बर नहीं थी किसी अख़बार में,
पर शहर ने अपने रंग कुछ फीके कर लिए।
कुछ लोग वही रहे, मगर बातें बीचों-बीच रुकीं,
और कुछ हँसीयाँ दूसरी भाषा बोलने लगीं।

एक आदमी के जीवन में उसकी उपस्थिति का प्रमाण
वही है कि जब वह नहीं होता
तो चीज़ें चोरी-सी होती हैं — मौसम की मुस्कान,
गीतों का पूरा सुर, रास्तों की सीधी चाल।

कभी-कभी रात में मैं उठकर खिड़की पर खड़ा होता हूँ,
ताकता हूँ उन बदलते-टिकते फसलों को —
और महसूस करता हूँ कि जो खोया है,
वह कहीं और से लौटता नहीं, पर कहीं और का सूरज ढलता है।

मुकेश ,,,,


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