मैंने अपने आँसुओं को
मैंने अपने आँसुओं को
बहने नहीं दिया।
उन्हें जमा करता रहा
पुराने सिक्कों की तरह।
वर्षों बाद
जब उन्हें गिनने बैठा,
तो पाया
हर सिक्के पर
किसी चेहरे की धुँधली छाप है।
कुछ प्रेम थे,
कुछ बिछोह,
कुछ वे लोग
जिन्होंने मुझे कभी पहचाना ही नहीं।
अब मेरी तिजोरी में
धन नहीं,
कुछ अधूरी पहचानें रखी हैं।
मुकेश ,,,,,,,
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