असंबाधं बध्यतो मानवानां…” — पृथ्वी सूक्त के द्वितीय मंत्र की वैज्ञानिक एवं शोधात्मक व्याख्या
असंबाधं बध्यतो मानवानां…” — पृथ्वी सूक्त के द्वितीय मंत्र की वैज्ञानिक एवं शोधात्मक व्याख्या
पृथ्वी सूक्त का द्वितीय मंत्र पृथ्वी के भौगोलिक विस्तार, उसकी जैव-विविधता तथा मानव जीवन के लिए उसके अनिवार्य योगदान का अत्यंत सुंदर चित्र प्रस्तुत करता है। प्रथम मंत्र में ऋषि ने पृथ्वी को धारण करने वाले नैतिक और आध्यात्मिक तत्त्वों की चर्चा की थी, जबकि इस मंत्र में वे पृथ्वी के प्रत्यक्ष स्वरूप—उसकी विशालता, भौगोलिक विविधता और औषधीय संपदा—का वर्णन करते हैं।
यह मंत्र विशेष रूप से उल्लेखनीय है क्योंकि इसमें पृथ्वी को केवल भूमि के रूप में नहीं, बल्कि मानव सभ्यता और समस्त जैविक जीवन के पोषणकर्ता के रूप में देखा गया है। आधुनिक भूगोल, पारिस्थितिकी (Ecology), वनस्पति विज्ञान (Botany) और पर्यावरण विज्ञान के अनेक सिद्धान्त इस मंत्र में निहित प्रतीत होते हैं।
मंत्र-पाठ
असंबाधं बध्यतो मानवानां यस्या उद्वतः प्रवतः समं बहु।नानावीर्या ओषधीर्या बिभर्ति पृथिवी नः प्रथतां राध्यतां नः॥
(अथर्ववेद, पृथ्वी सूक्त 12.1.2)
भावार्थ
यह पृथ्वी मनुष्यों के निवास और कर्म के लिए पर्याप्त स्थान प्रदान करती है। इसमें ऊँचे-नीचे प्रदेश, पर्वत, घाटियाँ और विस्तृत समभूमियाँ हैं। यह विविध गुणों और शक्तियों वाली असंख्य औषधियों को धारण करती है। ऐसी पृथ्वी हमें विस्तार, समृद्धि और कल्याण प्रदान करे।
पृथ्वी : मानव सभ्यता का विस्तृत आधार
मंत्र का आरम्भ “असंबाधम्” शब्द से होता है, जिसका अर्थ है—बिना संकीर्णता के, विस्तृत, अवरोधरहित।
ऋषि अनुभव करते हैं कि पृथ्वी मनुष्य को जीवन, विकास और कर्म के लिए पर्याप्त स्थान देती है। पृथ्वी किसी एक समुदाय, जाति या राष्ट्र की नहीं है; वह समस्त मानवता की माता है। यही कारण है कि वैदिक साहित्य में पृथ्वी का दृष्टिकोण सदैव सार्वभौमिक रहा है।
आधुनिक मानव भूगोल भी बताता है कि पृथ्वी का विशाल भूभाग विभिन्न प्रकार के मानवीय निवासों, कृषि क्षेत्रों, नगरों और सभ्यताओं के विकास का आधार बना। यदि पृथ्वी का भूगोल इतना विविध और विस्तृत न होता तो मानव सभ्यता आज के रूप में विकसित नहीं हो पाती।
इस प्रकार "असंबाधम्" केवल भौतिक विस्तार का संकेत नहीं, बल्कि जीवन की संभावनाओं के विस्तार का भी प्रतीक है।
भूगोल का वैदिक बोध
मंत्र में कहा गया है— “उद्वतः प्रवतः समं बहु”
अर्थात् पृथ्वी पर ऊँचे प्रदेश, ढलानदार क्षेत्र और समतल भूभाग विद्यमान हैं।यह वर्णन आश्चर्यजनक रूप से आधुनिक भूगोल के मूल स्वरूप से मेल खाता है।
आज भूविज्ञान पृथ्वी की सतह को मुख्यतः तीन प्रकारों में विभाजित करता है—
- पर्वतीय क्षेत्र (Mountains)
- ढाल एवं घाटी क्षेत्र (Slopes and Valleys)
- समतल मैदान (Plains)
ऋषि ने हजारों वर्ष पूर्व पृथ्वी के इन्हीं मूल भौगोलिक रूपों को पहचान लिया था।
विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि वैदिक कवि पृथ्वी का वर्णन किसी एक क्षेत्र विशेष के आधार पर नहीं करते, बल्कि सम्पूर्ण पृथ्वी की विविध संरचना को देखते हैं। यह दृष्टि पर्यवेक्षण (Observation) पर आधारित है, जो विज्ञान का भी प्रथम चरण है।
भूगर्भीय दृष्टि से मंत्र का महत्व
आधुनिक भूविज्ञान बताता है कि पृथ्वी की सतह निरंतर परिवर्तनशील है।
पर्वतों का निर्माण प्लेट विवर्तनिकी (Plate Tectonics) से होता है।
नदियाँ घाटियों का निर्माण करती हैं।
वायु और जल अपरदन (Erosion) के द्वारा भू-आकृतियों को बदलते रहते हैं।
ऋषि द्वारा पृथ्वी के ऊँचे, नीचे और समतल क्षेत्रों का उल्लेख इस तथ्य को इंगित करता है कि वे पृथ्वी को एक गतिशील और विविधतापूर्ण सत्ता के रूप में देख रहे थे।
यह दृष्टिकोण स्थिर भूगोल की अपेक्षा गतिशील भूगोल के अधिक निकट है।
जैव-विविधता का वैदिक उद्घोष
मंत्र का सबसे महत्वपूर्ण भाग है— “नानावीर्या ओषधीर्या बिभर्ति”
अर्थात् पृथ्वी अनेक प्रकार की शक्तियों वाली औषधियों को धारण करती है।
यहाँ "वीर्य" का अर्थ केवल शक्ति नहीं, बल्कि विशिष्ट गुण, प्रभाव और कार्यक्षमता भी है।
ऋषि यह स्वीकार करते हैं कि सभी वनस्पतियाँ समान नहीं हैं; प्रत्येक की अपनी विशेषता है।
आधुनिक वनस्पति विज्ञान भी यही कहता है कि पौधों में पाए जाने वाले जैव-रासायनिक यौगिक (Biochemical Compounds) भिन्न-भिन्न प्रकार के होते हैं।
किसी पौधे में रोगाणुरोधी गुण होते हैं, किसी में सूजनरोधी, किसी में पोषक तत्वों की प्रचुरता होती है।
वैदिक ऋषि ने इस विविधता को "नानावीर्या" शब्द में अत्यंत संक्षेप और प्रभावी ढंग से व्यक्त किया है।
औषधियाँ और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान
आज विश्व की अनेक औषधियाँ वनस्पतियों से प्राप्त होती हैं।
उदाहरणार्थ—
- अश्वगंधा में तनाव-नियंत्रक गुण
- हल्दी में करक्यूमिन
- नीम में जीवाणुरोधी तत्व
- तुलसी में प्रतिरक्षा-वर्धक गुण
आधुनिक औषधि-विज्ञान (Pharmacology) निरंतर नई वनस्पतियों का अध्ययन कर रहा है।
ऋषि के लिए पृथ्वी केवल मिट्टी नहीं, बल्कि औषधियों का विशाल भंडार है।
इस दृष्टि से यह मंत्र पृथ्वी को एक जीवित औषधीय प्रयोगशाला (Living Pharmacy) के रूप में देखता है।
पारिस्थितिकी और पृथ्वी
इस मंत्र का एक गहरा पारिस्थितिक संदेश भी है।
वनस्पतियाँ केवल औषधियाँ नहीं देतीं, वे—
- ऑक्सीजन प्रदान करती हैं,
- जलचक्र को संतुलित रखती हैं,
- मिट्टी का संरक्षण करती हैं,
- जैव-विविधता को बनाए रखती हैं।
यदि पृथ्वी से वनस्पति विविधता नष्ट हो जाए तो मानव जीवन भी संकट में पड़ जाएगा।
आज जैव-विविधता संरक्षण (Biodiversity Conservation) पर्यावरण विज्ञान का प्रमुख विषय है। पृथ्वी सूक्त का यह मंत्र इसी चेतना का अत्यंत प्राचीन स्रोत माना जा सकता है।
"प्रथतां राध्यतां नः" : विकास और समृद्धि का वैदिक आदर्श
मंत्र के अन्त में ऋषि प्रार्थना करते हैं—
“पृथिवी नः प्रथतां राध्यतां नः”
अर्थात् पृथ्वी हमें विस्तार और समृद्धि प्रदान करे।
यहाँ विस्तार का अर्थ केवल भौतिक संपन्नता नहीं है।
यह ज्ञान, संस्कृति, स्वास्थ्य, कृषि, पर्यावरण और सामाजिक विकास—सभी का विस्तार है।
वेद का आदर्श विकास प्रकृति के विनाश पर आधारित नहीं है, बल्कि प्रकृति के साथ सामंजस्य पर आधारित है।
यह विचार आधुनिक सतत विकास (Sustainable Development) की मूल भावना से मेल खाता है।
पृथ्वी सूक्त का यह मंत्र वैदिक साहित्य में निहित वैज्ञानिक चेतना का उत्कृष्ट उदाहरण है। ऋषि पृथ्वी को एक विशाल भूगोल, विविध भू-आकृतियों और असंख्य औषधीय वनस्पतियों से सम्पन्न जीवंत सत्ता के रूप में देखते हैं। पर्वतों, घाटियों और मैदानों का उल्लेख भूगोल की सूक्ष्म समझ को प्रकट करता है, जबकि "नानावीर्या ओषधयः" का विचार आधुनिक वनस्पति विज्ञान और औषधि-विज्ञान की पूर्वपीठिका जैसा प्रतीत होता है।
इस प्रकार यह मंत्र हमें स्मरण कराता है कि पृथ्वी केवल रहने का स्थान नहीं, बल्कि जीवन, स्वास्थ्य, ज्ञान और समृद्धि का आधार है। उसकी जैव-विविधता और प्राकृतिक संतुलन की रक्षा करना केवल पर्यावरणीय दायित्व नहीं, बल्कि वैदिक दृष्टि में एक सांस्कृतिक और नैतिक कर्तव्य भी है।
समापन श्लोक
उच्चावचैः प्रदेशैश्च नानौषधिसमन्विता।धरा धारयते लोकान् मातेव करुणान्विता॥
(व्याख्यात्मक रचना; मूल वैदिक मंत्र नहीं।)
मुकेश ,,,,,,,
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