तूफ़ान के बाद की सुबह – ४
तूफ़ान के बाद की सुबह – ४
सुबह धूप लेकर नहीं आई थी।
सिर्फ़ उजाला था—
ठंडा और बिना रंग का।
सड़क सूखी थी,
पर उसमें दरारें गहरी हो गई थीं।
जैसे ज़मीन ने रात भर में
कुछ ज़्यादा याद कर लिया हो।
वह आदमी फिर उसी जगह था।
अब वह लौटकर नहीं आया था,
बस आकर रुक गया था।
मकान के भीतर अब आवाज़ नहीं थी।
दीवारें अपनी जगह पर थीं,
पर उनमें कुछ ढीला पड़ गया था।
उसने दरवाज़ा धक्का दिया।
धीरे।
दरवाज़ा मान गया।
अंदर हवा नहीं थी।
सिर्फ़ बासी समय था
जो कोनों में बैठा था।
फर्श पर कुछ काग़ज़ पड़े थे।
गीले,
और अधूरे शब्दों से भरे।
उसने उन्हें उठाया नहीं।
कुछ चीज़ें
उठाने से और भारी हो जाती हैं।
कमरे के बीच
एक निशान था—
जहाँ कभी कोई बैठता था।
अब वहाँ सिर्फ़ खाली जगह थी,
जो अपने होने को छुपा नहीं पा रही थी।
वह आदमी वहीं खड़ा रहा।
काफी देर।
फिर उसने समझ लिया—
तूफ़ान ने कुछ तोड़ नहीं दिया था।
उसने सिर्फ़ दिखा दिया था
कि चीज़ें पहले ही टूट चुकी थीं।
वह बाहर आ गया।
दरवाज़ा पीछे से धीरे बंद हो गया।
सड़क अब शांत थी।
बहुत शांत।
और उस शांति में
कोई लौटने का वादा नहीं था।
मुकेश ,,,,,,,,,
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