यस्यामापः परिचराः समानीरहोरात्रे...” — पृथ्वी सूक्त के नवम मंत्र की वैज्ञानिक एवं शोधात्मक व्याख्या
- Get link
- X
- Other Apps
यस्यामापः परिचराः समानीरहोरात्रे...” — पृथ्वी सूक्त के नवम मंत्र की वैज्ञानिक एवं शोधात्मक व्याख्या
पृथ्वी सूक्त का नवम मंत्र पृथ्वी और जल के गहन संबंध का अत्यंत सुंदर वर्णन करता है। यदि तृतीय मंत्र में समुद्रों, नदियों और अन्नोत्पादन की चर्चा थी, तो इस मंत्र में ऋषि जल के निरन्तर प्रवाह, उसके चक्र तथा पृथ्वी की पोषणकारी शक्ति पर ध्यान केन्द्रित करते हैं। यह मंत्र विशेष रूप से आधुनिक जलविज्ञान (Hydrology), जलचक्र (Water Cycle) तथा पारिस्थितिकी (Ecology) के सन्दर्भ में अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रतीत होता है।
ऋषि जल को स्थिर पदार्थ नहीं मानते। उनके लिए जल एक सतत गतिशील शक्ति है जो दिन-रात पृथ्वी पर जीवन का पोषण करती रहती है। यही कारण है कि वे पृथ्वी को "भूरिधारा" अर्थात् असंख्य धाराओं की धारिणी कहते हैं।
मंत्र-पाठ -
यस्यामापः परिचराः समानीर्
अहोरात्रे अप्रमादं क्षरन्ति।
सा नो भूमिर्भूरिधारा पयो दुहाम्
अथो उक्षतु वर्चसा॥ ९॥
जिस पृथ्वी पर जलराशियाँ निरन्तर प्रवाहित होती रहती हैं, जो दिन-रात बिना प्रमाद के अपना कार्य करती हैं, वह अनेक धाराओं वाली पृथ्वी हमारे लिए पोषक रस और समृद्धि का दुग्ध प्रदान करे तथा हमें तेज और ओज से अभिसिंचित करे।
जल : पृथ्वी का जीवन-रक्त
मंत्र का आरम्भ होता है—“यस्यामापः परिचराः”
अर्थात् जिस पृथ्वी पर जल निरन्तर संचरण करता रहता है।
यहाँ "परिचराः" शब्द अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
इसका अर्थ है—
- घूमना,
- प्रवाहित होना,
- निरन्तर कार्य करना।
ऋषि जल को स्थिर नहीं देखते, बल्कि एक गतिशील तत्त्व के रूप में देखते हैं।
आधुनिक विज्ञान भी बताता है कि पृथ्वी पर जल सदैव गतिशील रहता है—
- समुद्र से वाष्प बनता है,
- बादल बनाता है,
- वर्षा के रूप में गिरता है,
- नदियों में बहता है,
- भूजल बनता है,
- पुनः समुद्र में पहुँचता है।
यह निरन्तर संचरण ही पृथ्वी पर जीवन को सम्भव बनाता है।
“समानीः” : जल का वैश्विक चक्र
मंत्र में जल को “समानीः” कहा गया है।
यह संकेत करता है कि पृथ्वी पर विविध जलराशियाँ अन्ततः एक व्यापक तंत्र का भाग हैं।
आज जलविज्ञान भी यही बताता है कि— नदियाँ,झीलें,हिमनद,भूजल,महासागर,
सभी एक ही वैश्विक जलचक्र (Global Water Cycle) से जुड़े हुए हैं।
ऋषि इस एकात्मता को अनुभव करते हैं।
उनके लिए पृथ्वी पर बहने वाला समस्त जल एक साझा जीवन-व्यवस्था का अंग है।
“अहोरात्रे अप्रमादं क्षरन्ति” : प्रकृति की अविराम कार्यप्रणाली
मंत्र का अगला भाग कहता है— “अहोरात्रे अप्रमादं क्षरन्ति”
अर्थात् दिन और रात निरन्तर, बिना किसी प्रमाद के प्रवाहित होते रहते हैं।
यहाँ ऋषि प्रकृति की अद्भुत नियमितता को देख रहे हैं।
वैज्ञानिक दृष्टि
प्रकृति की अनेक प्रक्रियाएँ बिना रुके चलती रहती हैं— जलचक्र,वायु-परिसंचरण,कार्बन चक्र,नाइट्रोजन चक्र,प्रकाश संश्लेषण
ये प्रक्रियाएँ मनुष्य की इच्छा पर निर्भर नहीं हैं।
वे निरन्तर और नियमपूर्वक कार्य करती रहती हैं।
आज विज्ञान इसे पृथ्वी की Self-Regulating Systems कहता है।
ऋषि इसी तथ्य को "अप्रमादं" शब्द में व्यक्त करते हैं।
भूरिधारा : अनेक धाराओं की धारिणी
मंत्र में पृथ्वी को कहा गया है— “भूरिधारा”
अर्थात् अनेक धाराओं वाली।
यह शब्द अत्यंत वैज्ञानिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है।
पृथ्वी पर जल केवल नदियों में ही नहीं है।
वह— हिमालय के हिमनदों में है,झीलों में है,भूमिगत जल में है,वायुमण्डल में है,समुद्रों में है।
आज पृथ्वी को "Blue Planet" कहा जाता है क्योंकि उसका विशाल भाग जल से आच्छादित है।
ऋषि "भूरिधारा" शब्द के माध्यम से इसी जलसम्पन्न पृथ्वी का चित्र प्रस्तुत करते हैं।
“पयो दुहाम्” : पोषण का रूपक
मंत्र में प्रार्थना की गई है— “पयो दुहाम्”
अर्थात् पृथ्वी हमें दूध की भाँति पोषण प्रदान करे।
यहाँ "पयः" केवल दूध नहीं है।
वैदिक साहित्य में पयः का अर्थ है— जल,पोषण,जीवनरस,उर्वरता।
आधुनिक वैज्ञानिक भाषा में कहें तो पृथ्वी के जलस्रोत—
- कृषि को सम्भव बनाते हैं,
- खाद्य उत्पादन को बढ़ाते हैं,
- जैव-विविधता को बनाए रखते हैं।
इस प्रकार पृथ्वी वास्तव में जीवनदायिनी माता की भाँति पोषण करती है।
जल और सभ्यता
मानव इतिहास का अध्ययन बताता है कि महान सभ्यताएँ जलस्रोतों के आसपास विकसित हुईं—
- सिंधु घाटी सभ्यता
- मिस्र की नील सभ्यता
- मेसोपोटामिया सभ्यता
जल के बिना न कृषि सम्भव है, न नगर, न व्यापार और न संस्कृति।
ऋषि इस तथ्य को प्रत्यक्ष रूप से न कहते हुए भी जल की निरन्तरता और पृथ्वी की जलधाराओं का वर्णन करके स्पष्ट कर देते हैं।
“उक्षतु वर्चसा” : जल, स्वास्थ्य और तेज
मंत्र के अन्त में पुनः वही प्रार्थना है— “उक्षतु वर्चसा”
अर्थात् हमें वर्चस्, तेज और शक्ति प्रदान करे।
आधुनिक विज्ञान के अनुसार भी जल और स्वास्थ्य का गहरा सम्बन्ध है।
स्वच्छ जल—
- स्वास्थ्य देता है,
- कृषि को समृद्ध करता है,
- अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करता है,
- समाज को स्थिर बनाता है।
इस प्रकार जल का संरक्षण केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि सामाजिक और राष्ट्रीय आवश्यकता भी है।
पर्यावरणीय सन्देश
यह मंत्र आज के युग में विशेष रूप से प्रासंगिक है।
जब विश्व— जल संकट,भूजल ह्रास,नदियों के प्रदूषण,जलवायु परिवर्तन
जैसी समस्याओं से जूझ रहा है, तब यह मंत्र हमें स्मरण कराता है कि जल पृथ्वी का प्राण है।
यदि जलचक्र बाधित होगा तो पृथ्वी का सम्पूर्ण जीवन-तंत्र प्रभावित होगा।
पृथ्वी सूक्त का नवम मंत्र जल और पृथ्वी के अविभाज्य सम्बन्ध का अत्यन्त सूक्ष्म चित्र प्रस्तुत करता है। इसमें जल की निरन्तर गति, दिन-रात चलने वाली प्राकृतिक प्रक्रियाओं की नियमितता, पृथ्वी की जलसम्पन्नता और उसके पोषणकारी स्वरूप का वर्णन है।
वैज्ञानिक दृष्टि से यह मंत्र जलचक्र, पारिस्थितिकी, पर्यावरणीय संतुलन और सतत संसाधन-प्रबंधन की मूल अवधारणाओं का वैदिक रूप प्रस्तुत करता है। ऋषि का संदेश स्पष्ट है—पृथ्वी का जल केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार है; उसका संरक्षण मानव सभ्यता की निरन्तरता के लिए अनिवार्य है।
समापन श्लोक
अहोरात्रं प्रवहन्त्यापो जीवनस्य परमा गतिः।
भूरिधारा धरा मातापाययत्वोजसा सह॥
(यह व्याख्यात्मक श्लोक है, मूल वैदिक मंत्र नहीं।)
मुकेश ,,,,,,,,,
- Get link
- X
- Other Apps
Comments
Post a Comment