शब्दयात्री — सुनने का हुनर

 शब्दयात्री — सुनने का हुनर

इन दिनों मुझे बोलने से ज़्यादा सुनना अच्छा लगता है।

शायद इसलिए नहीं कि लोगों के पास कहने को बहुत कुछ है, बल्कि इसलिए कि जो सबसे ज़रूरी होता है, वह अक्सर कहा नहीं जाता।

वह आवाज़ और अल्फ़ाज़ के दरमियान कहीं ठहरा रहता है।

पहले मैं सिर्फ़ अल्फ़ाज़ सुनता था।

अब उनके पीछे की ख़ामोशी भी सुनने लगा हूँ।

किसी की मुस्कुराहट के पीछे छिपी थकान सुन लेता हूँ।

किसी की हँसी में दबा हुआ अकेलापन सुन लेता हूँ।

किसी के "मैं ठीक हूँ" के भीतर टूटती हुई आवाज़ सुन लेता हूँ।

तब समझ में आया कि सुनना, कानों का काम कम और दिल का काम ज़्यादा है।

हर आवाज़ सुन लेना, सुनना नहीं होता।

सुनना तब शुरू होता है जब अपने भीतर का शोर थोड़ा-सा थम जाए।

जब अपने जवाबों की जल्दी ख़त्म हो जाए।

जब सामने वाले की बात पूरी होने से पहले अपनी राय देने की बेचैनी मर जाए।

सुनना दरअसल किसी को अपनी मौजूदगी का सबसे ख़ूबसूरत तोहफ़ा देना है।

बिना टोके...

बिना समझाए...

बिना फ़ैसला सुनाए...

बस उसके साथ ठहर जाना।

मैंने देखा है—

पेड़ हवा को सुनते हैं,

नदियाँ किनारों को सुनती हैं,

रात सितारों को सुनती है,

और धरती हर गिरती हुई बूँद को सुनती है।

शायद इसी लिए प्रकृति में इतना सुकून है।

वहाँ कोई किसी पर बोलता नहीं,

सब एक-दूसरे को सुनते हैं।

अब कभी-कभी मैं अपनी भी सुनता हूँ।

अपने भीतर उठती हुई उस आवाज़ को, जिसे बरसों तक दुनिया के शोर में दबाए रखा।

उसकी भी अपनी एक ज़ुबान है।

वह अल्फ़ाज़ में नहीं बोलती।

वह एहसास में बोलती है।

और जब मैं उसे सचमुच सुन लेता हूँ,

तो लगता है—

मैंने किसी और को नहीं,

पहली बार ख़ुद को सुना है।

शायद सुनना ही इबादत का पहला क़दम है।

क्योंकि जो सचमुच सुन सकता है,

वही सचमुच समझ सकता है।

और जो समझ लेता है,

उसे फिर बहुत कम बोलना पड़ता है।

मुकेश ,,,,,,,

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