हस्ताक्षर
हस्ताक्षर
क़लम अब
सिर्फ़ हस्ताक्षर नहीं करती।
वह रोती भी है।
जब उसे
किसी कवि की मेज़ से उठाकर
किसी समझौते पर रख दिया जाता है।
जब उसे
प्रेमपत्र से हटाकर
त्यागपत्र लिखवाया जाता है।
जब उससे
कविता की जगह
केवल स्वीकृतियाँ माँगी जाती हैं।
स्याही जानती है
कि उसका जन्म
मुहर बनने के लिए नहीं हुआ था।
वह नदी बनना चाहती थी।
मुकेश ,,,,
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