शब्दयात्री : रेतघड़ी

शब्दयात्री : रेतघड़ी

मेरे भीतर एक रेतघड़ी भी है।

धूपघड़ी की तरह उसे सूर्य की आवश्यकता नहीं। वह अपने भीतर ही समय को बहाती रहती है।

मैं उसे देखता हूँ तो लगता है, जीवन भी कुछ ऐसा ही है। ऊपर का पात्र भविष्य है, नीचे का पात्र स्मृति। और वर्तमान वह सँकरा-सा मार्ग है, जहाँ से होकर हर कण गुज़रता है।

जब वह मेरे साथ थी, तब मैंने रेत को गिरते हुए नहीं देखा। सुख में समय का प्रवाह दिखाई नहीं देता। लेकिन उसके जाने के बाद पहली बार मुझे हर गिरता हुआ कण सुनाई देने लगा।

एक दिन।

एक मौसम।

एक वर्ष।

फिर दूसरा।

फिर तीसरा।

धीरे-धीरे ऊपर का पात्र खाली होता गया।

लेकिन आश्चर्य यह है कि नीचे का पात्र भरता गया।

वहाँ स्मृतियाँ जमा होती रहीं।

उसकी हँसी।

उसकी चुप्पी।

एक अधूरा वाक्य।

एक अनकही विदाई।

रेतघड़ी ने मुझे सिखाया कि समय कभी नष्ट नहीं होता। वह केवल अपना स्थान बदलता है।

जो भविष्य था, वह वर्तमान बनता है।

जो वर्तमान था, वह स्मृति।

और अन्ततः हम सब अपने ही भीतर भरी हुई उस रेत को देखते रह जाते हैं, जो कभी हमारे हाथों से फिसलती चली गई थी।

मैं आज भी उस रेतघड़ी को उलटता नहीं।

उसे बहने देता हूँ।

क्योंकि कुछ यात्राएँ रोकी नहीं जातीं।

उन्हें केवल देखा जाता है।

जैसे रेत को।

जैसे समय को।

जैसे किसी प्रिय की स्मृति को।

— मुकेश

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