भगवद्गीता प्रथम अध्याय, प्रथम श्लोक : एक शोधपूर्ण एवं नवोन्मेषी विश्लेषण

 भगवद्गीता प्रथम अध्याय, प्रथम श्लोक : एक शोधपूर्ण एवं नवोन्मेषी विश्लेषण

मूल श्लोक

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः। मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय॥ १.१॥

अन्वय

हे सञ्जय! धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा रखने वाले मेरे पुत्र और पाण्डु के पुत्र एकत्र होकर क्या कर रहे थे?

सामान्य हिन्दी अर्थ

धृतराष्ट्र संजय से पूछते हैं—हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध के लिए एकत्रित हुए मेरे पुत्र तथा पाण्डवों ने क्या किया?

सम्पूर्ण भगवद्गीता का प्रारम्भ एक प्रश्न से होता है। यह अत्यन्त आश्चर्यजनक तथ्य है कि भगवान् श्रीकृष्ण का उपदेश बाद में आता है, पहले आता है एक अंधे राजा का प्रश्न।

यदि सम्पूर्ण गीता को मानव-चेतना का महाग्रन्थ माना जाए, तो यह पहला श्लोक मानव-मस्तिष्क के संकट का उद्घाटन है।

आज तक अधिकांश भाष्यकारों ने इस श्लोक को ऐतिहासिक, नैतिक अथवा आध्यात्मिक दृष्टि से देखा है। यहाँ हम इसे चेतना-विज्ञान (Consciousness Science), मनोविज्ञान, तंत्रिका-विज्ञान (Neuroscience), क्वाण्टम संभावना तथा आध्यात्मिकता के संयुक्त दृष्टिकोण से देखने का प्रयास करेंगे।

1. धृतराष्ट्र : केवल व्यक्ति नहीं, अन्धा मस्तिष्क

"धृतराष्ट्र" शब्द दो भागों से बना है—

धृत = पकड़कर रखा हुआ 

राष्ट्र = राज्य, क्षेत्र, व्यवस्था 

अर्थात्—

जो व्यवस्था को पकड़े हुए है।

यहाँ धृतराष्ट्र केवल हस्तिनापुर का राजा नहीं है।

वह मानव-मस्तिष्क का वह भाग है जो सत्ता, आदत, अहंकार और स्वार्थ को पकड़े रहता है।

विशेष बात यह है कि धृतराष्ट्र जन्म से अन्धा है।

आधुनिक न्यूरोसाइंस बताती है कि मनुष्य का मस्तिष्क अनेक निर्णय बिना पूर्ण सत्य को देखे ही ले लेता है। इसे Cognitive Bias कहते हैं।

इस दृष्टि से—

धृतराष्ट्र = अज्ञानग्रस्त निर्णय-प्रणाली।

गीता की शुरुआत ही बताती है—

जब निर्णय लेने वाला केन्द्र अन्धा हो जाता है, तब जीवन में महाभारत उत्पन्न होता है।

2. धर्मक्षेत्रे : ब्रह्माण्ड का नैतिक गुरुत्वाकर्षण

सामान्यतः धर्मक्षेत्र का अर्थ है—  "धर्म की भूमि।"

किन्तु यहाँ एक गहन प्रश्न है।

यदि धर्म केवल मनुष्य की कल्पना है तो फिर कुरुक्षेत्र को धर्मक्षेत्र क्यों कहा गया?

आधुनिक विज्ञान बताता है कि ब्रह्माण्ड में केवल भौतिक नियम ही नहीं, बल्कि जटिल प्रणालियों में आत्म-संतुलन (Self-regulation) की प्रवृत्ति भी होती है।

जीवविज्ञान में इसे Homeostasis कहा जाता है।

ब्रह्माण्ड अव्यवस्था से व्यवस्था की ओर बढ़ने का प्रयास करता है। यही धर्म है।

अतः—

धर्मक्षेत्र = वह क्षेत्र जहाँ प्रकृति स्वयं संतुलन स्थापित करना चाहती है।

कुरुक्षेत्र केवल हरियाणा का मैदान नहीं है।

मानव-चेतना का वह स्तर है जहाँ सत्य और असत्य आमने-सामने खड़े होते हैं।

3. कुरुक्षेत्र : कर्मक्षेत्र

"कुरु" धातु का अर्थ है—

"करो"।

कुरुक्षेत्र अर्थात्—

कर्म का क्षेत्र।

इस प्रकार पहले ही श्लोक में दो स्तर उपस्थित हैं—

धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र

मूल्य कर्म

सिद्धान्त व्यवहार

आदर्श क्रिया

चेतना जीवन

मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन इन्हीं दोनों के बीच चलता है।

4. एक अद्भुत रहस्य : धर्मक्षेत्र पहले, कुरुक्षेत्र बाद में

श्लोक में क्रम देखिए—

धर्मक्षेत्रे → कुरुक्षेत्रे

यदि युद्धभूमि का वर्णन करना होता तो पहले कुरुक्षेत्र आना चाहिए था।

परन्तु व्यास पहले धर्मक्षेत्र कहते हैं।

यह संकेत है— कर्म से पहले धर्म है। क्रिया से पहले चेतना है।परिणाम से पहले मूल्य हैं।

आधुनिक प्रबन्धन-विज्ञान भी इसी निष्कर्ष पर पहुँचा है—

Values drive behaviour.

5. "मामकाः" : गीता का पहला मनोवैज्ञानिक रोग

धृतराष्ट्र कहता है— मामकाः (मेरे लोग)

फिर कहता है— पाण्डवाः (पाण्डु के लोग)

वह दोनों को "हमारे" नहीं कहता।

यहीं से विनाश प्रारम्भ होता है।

आधुनिक मनोविज्ञान में इसे In-group Bias कहते हैं।

जब मनुष्य संसार को

मेरे लोग 

दूसरे लोग 

में बाँट देता है, तब संघर्ष जन्म लेता है। -महाभारत की जड़ दुर्योधन नहीं है। महाभारत की जड़ "मामकाः" है।

6. "समवेता" : चेतना की ऊर्जा-संघनन अवस्था

समवेता = एकत्रित होना।

यह केवल सैनिकों का एकत्र होना नहीं है।

भौतिकी में जब ऊर्जा किसी बिन्दु पर केन्द्रित होती है तो परिवर्तन होता है।

लेज़र इसी सिद्धान्त पर कार्य करता है।

मानव-जीवन में भी जब - इच्छाएँ ,भय ,स्मृतियाँ ,आकांक्षाएँ  एक बिन्दु पर केन्द्रित होती हैं, तब निर्णायक घटना घटती है।

महाभारत उसी ऊर्जा-संघनन का परिणाम है।

7. "युयुत्सवः" : संघर्ष की जैविक प्रवृत्ति

युयुत्सवः = युद्ध करने के इच्छुक।

यहाँ युद्ध केवल हथियारों का नहीं है।जीवविज्ञान बताता है कि प्रत्येक जीव के भीतर Survival Instinct होती है।

मनुष्य में यही प्रवृत्ति अनेक रूप लेती है— प्रतियोगिता ,ईर्ष्या ,संघर्ष ,महत्वाकांक्षा,प्रभुत्व 

महाभारत इस जैविक ऊर्जा का सामाजिक रूप है।

8. "किमकुर्वत" : सम्पूर्ण गीता का मूल प्रश्न

धृतराष्ट्र पूछता है— क्या किया?

वह यह नहीं पूछता— कौन जीतेगा? , कौन मरेगा?, किसकी शक्ति अधिक है?

उसका प्रश्न है— "क्या किया?"

यही कर्म का प्रश्न है।

गीता का केन्द्र परिणाम नहीं, कर्म है।

9. संजय : आन्तरिक साक्षी

संजय शब्द का अर्थ है— "जिसने स्वयं पर विजय प्राप्त कर ली।"

धृतराष्ट्र अन्धा है। संजय देख सकता है। यह अत्यन्त गहरा प्रतीक है।

मनुष्य के भीतर दो केन्द्र हैं— अन्धा मन , जाग्रत साक्षी 

जब जीवन में संकट आता है तो उत्तर मन नहीं देता।

उत्तर साक्षी देता है।

10. एक नवीन वैज्ञानिक-आध्यात्मिक व्याख्या

यदि सम्पूर्ण श्लोक को मानव-मस्तिष्क का सूत्र मानें तो उसका अर्थ होगा—

"अहंकार से ग्रस्त अन्धा मन अपने भीतर उपस्थित जाग्रत साक्षी से पूछ रहा है कि धर्म और कर्म के संगमस्थल पर एकत्रित हुई मेरी आसक्तियाँ और मेरी उच्चतर संभावनाएँ अब क्या कर रही हैं?"

यह व्याख्या गीता को बाहरी युद्ध से उठाकर आन्तरिक चेतना-विज्ञान का ग्रन्थ बना देती है।

भगवद्गीता का प्रथम श्लोक केवल युद्धभूमि का परिचय नहीं है। यह मानव-चेतना का प्रथम एक्स-रे है।

धृतराष्ट्र = अन्धा अहंकार 

संजय = साक्षी चेतना 

धर्मक्षेत्र = ब्रह्माण्डीय संतुलन 

कुरुक्षेत्र = कर्मभूमि 

मामकाः = आसक्ति 

पाण्डवाः = विवेक 

युयुत्सवः = आन्तरिक संघर्ष 

किमकुर्वत = जीवन का मूल प्रश्न 

इस प्रकार गीता का पहला श्लोक हमें बताता है कि महाभारत बाहर नहीं, पहले भीतर घटित होता है। जब मनुष्य के भीतर "मामकाः" और "पाण्डवाः" आमने-सामने खड़े हो जाते हैं, तब आत्मा का संजय ही सत्य का वृत्तान्त सुनाता है।

अतः गीता का प्रथम श्लोक वास्तव में मानव-चेतना के युद्ध का उद्घोष है, और सम्पूर्ण गीता उसी युद्ध का समाधान।

— मुकेश

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