असम्भव का अभ्यास

असम्भव का अभ्यास

प्रेम

असम्भव को मानने से शुरू नहीं होता।

वह उसे अस्वीकार भी नहीं करता।

वह बस

उसके साथ रहने लगता है।

जैसे कोई नदी

पत्थरों से बहस नहीं करती।

वे उसे रोकते हैं,

वह उन्हें आकार देती है।

प्रेम भी

असम्भवता से टकराकर नहीं टूटता।

वह उसके भीतर

नई दिशा खोज लेता है।

मुकेश ,,,,

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