यो नो द्वेषत् पृथिवि…” — पृथ्वी सूक्त के चतुर्दश मंत्र की वैज्ञानिक, दार्शनिक एवं शोधात्मक व्याख्या
“यो नो द्वेषत् पृथिवि…” — पृथ्वी सूक्त के चतुर्दश मंत्र की वैज्ञानिक, दार्शनिक एवं शोधात्मक व्याख्या
पृथ्वी सूक्त का चतुर्दश मंत्र प्रथम दृष्टि में शत्रुओं से रक्षा की प्रार्थना प्रतीत होता है, किन्तु गहन अध्ययन करने पर यह केवल युद्ध अथवा व्यक्तिगत वैर का मंत्र नहीं है। यह मंत्र मानव सुरक्षा (Human Security), सामाजिक स्थिरता (Social Stability), राष्ट्रीय एकता (National Integrity) तथा मानसिक हिंसा (Psychological Aggression) के विरुद्ध एक सार्वभौमिक प्रार्थना है।
वैदिक ऋषि जानते थे कि पृथ्वी केवल प्राकृतिक आपदाओं से ही नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर उत्पन्न होने वाले द्वेष, हिंसा, लोभ और विनाशकारी प्रवृत्तियों से भी संकट में पड़ती है। इसलिए इस मंत्र में बाह्य शत्रु से अधिक अधर्म, हिंसा और विनाशकारी मानसिकता को परास्त करने की कामना की गई है।
आधुनिक युग में, जब युद्ध, आतंकवाद, जैविक हथियार, साइबर आक्रमण, सामाजिक घृणा और पर्यावरणीय विनाश मानव सभ्यता के सामने गंभीर चुनौतियाँ हैं, तब यह मंत्र अत्यन्त प्रासंगिक हो उठता है।
मंत्र-पाठ
यो नो द्वेषत् पृथिवियः पृतन्याद्योऽभिदासान्मनसा यो वधेन।तं नो भूमे रन्धयपूर्वकृत्वारि॥ १४॥
भावार्थ
हे पृथ्वी! जो हमसे द्वेष करता है, जो युद्ध या संघर्ष उत्पन्न करता है, जो मन से अथवा हिंसा द्वारा हमें हानि पहुँचाना चाहता है—ऐसे विनाशकारी तत्वों का पहले ही निराकरण कर दे और हमारी रक्षा कर।
“यो नो द्वेषत्” : द्वेष का मनोविज्ञान
मंत्र का आरम्भ होता है— “यो नो द्वेषत्”
अर्थात् जो हमसे द्वेष करता है।
ऋषि शत्रु की पहचान उसके बाह्य रूप से नहीं, बल्कि उसके द्वेष से करते हैं।
यह अत्यन्त सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक दृष्टि है।
आधुनिक मनोविज्ञान बताता है कि—
हिंसा का जन्म पहले मन में होता है।
घृणा (Hatred) से आक्रामकता (Aggression) उत्पन्न होती है।
आक्रामकता से संघर्ष (Conflict) जन्म लेता है।
और संघर्ष अंततः युद्ध का रूप ले सकता है।
अर्थात् युद्ध का वास्तविक आरम्भ रणभूमि में नहीं, बल्कि मानव-मन में होता है।
ऋषि हजारों वर्ष पहले इसी तथ्य को पहचान चुके थे।
“यः पृतन्यात्” : संघर्ष की सामाजिक व्याख्या
"पृतन्या" का अर्थ है— युद्ध,संघर्ष, आक्रमण।
यह केवल सैन्य युद्ध नहीं है।
आधुनिक समाज में संघर्ष के अनेक रूप हैं— वैचारिक संघर्ष, आर्थिक संघर्ष, धार्मिक संघर्ष, सांस्कृतिक संघर्ष,संसाधनों के लिए संघर्ष।
आज समाजशास्त्र (Sociology) और राजनीति विज्ञान (Political Science) भी स्वीकार करते हैं कि असंतुलित संसाधन-वितरण और असमानता सामाजिक संघर्ष को जन्म देते हैं।
ऋषि पृथ्वी से प्रार्थना करते हैं कि ऐसी विनाशकारी प्रवृत्तियाँ समाज पर हावी न हों।
“योऽभिदासान्मनसा” : मानसिक हिंसा की पहचान
मंत्र का सबसे गहरा भाग है— “योऽभिदासान्मनसा”
अर्थात् जो मन से हमें हानि पहुँचाना चाहता है।
यहाँ एक अत्यन्त आधुनिक विचार उपस्थित है।
ऋषि केवल शारीरिक हिंसा की बात नहीं करते; वे मानसिक हिंसा को भी उतना ही घातक मानते हैं।
आज मनोविज्ञान बताता है कि—
मानसिक उत्पीड़न (Psychological Abuse),
घृणा-प्रचार (Hate Speech),
मानसिक युद्ध (Psychological Warfare),
दुष्प्रचार (Propaganda)
भी समाज को गम्भीर क्षति पहुँचाते हैं।
यह मंत्र इस तथ्य की वैदिक अभिव्यक्ति है।
“यो वधेन” : प्रत्यक्ष हिंसा
यहाँ "वध" का अर्थ है— शारीरिक आक्रमण, हत्या, विनाश।
आधुनिक विश्व में— युद्ध, आतंकवाद, सामूहिक हिंसा, जैविक हथियार,
मानव सभ्यता के लिए बड़े खतरे हैं।
ऋषि इन सभी विनाशकारी प्रवृत्तियों से पृथ्वी पर रहने वाले लोगों की रक्षा की कामना करते हैं।
“तं नो भूमे रन्धय” : पृथ्वी से रक्षा की प्रार्थना
ऋषि कहते हैं— “तं नो भूमे रन्धय”
अर्थात् हे पृथ्वी! ऐसे विनाशकारी तत्वों को निष्प्रभावी कर दे।
यहाँ पृथ्वी को न्यायकारी माता के रूप में देखा गया है।
महत्त्वपूर्ण बात यह है कि ऋषि स्वयं प्रतिशोध लेने की बात नहीं करते।
वे पृथ्वी की नैतिक व्यवस्था पर विश्वास करते हैं।
यह विचार आधुनिक Rule of Law और Natural Justice की अवधारणाओं से मिलता-जुलता है।
“पूर्वकृत्वारि” : संकट की पूर्व-रोकथाम
मंत्र का अंतिम शब्द है— “पूर्वकृत्वारि”
अर्थात् पहले ही, प्रारम्भ में ही।
यही इस मंत्र की सबसे आधुनिक वैज्ञानिक विशेषता है।
आधुनिक विज्ञान और नीति-निर्माण में एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त है—
Prevention is better than cure.
उदाहरण—
महामारी रोकथाम,
आपदा प्रबंधन,
जलवायु परिवर्तन की रोकथाम,
अपराध-निवारण,
साइबर सुरक्षा।
ऋषि भी यही प्रार्थना करते हैं कि संकट उत्पन्न होने से पहले ही उसका निराकरण हो जाए।
यह आधुनिक Preventive Science और Risk Management की मूल भावना है।
पर्यावरणीय दृष्टि
यदि इस मंत्र को पर्यावरण के सन्दर्भ में पढ़ें, तो "शत्रु" केवल मनुष्य नहीं है।
आज पृथ्वी के शत्रु हैं—
प्रदूषण,
वनों की अंधाधुंध कटाई,
जलवायु परिवर्तन,
जैव-विविधता का विनाश,
प्राकृतिक संसाधनों का अति-दोहन।
ये सभी पृथ्वी के विरुद्ध मानव द्वारा किए गए "वध" के ही रूप हैं।
इसलिए यह मंत्र हमें चेतावनी देता है कि पृथ्वी की रक्षा केवल बाहरी शत्रुओं से नहीं, बल्कि हमारी अपनी विनाशकारी प्रवृत्तियों से भी करनी होगी।
वैज्ञानिक निष्कर्ष
यह मंत्र आधुनिक विज्ञान और समाज-विज्ञान की अनेक अवधारणाओं से मेल खाता है—
| वैदिक अवधारणा | आधुनिक वैज्ञानिक समानता |
|---|---|
| द्वेष | सामाजिक एवं व्यवहारिक मनोविज्ञान (Social Psychology) |
| पृतन्या | संघर्ष-अध्ययन (Conflict Studies) |
| मनसा अभिदास | मानसिक युद्ध, मनोवैज्ञानिक हिंसा |
| वध | प्रत्यक्ष हिंसा एवं सुरक्षा अध्ययन |
| पूर्वकृत्वारि | जोखिम-प्रबंधन (Risk Management), पूर्व-निवारण (Prevention) |
पृथ्वी सूक्त का चतुर्दश मंत्र केवल शत्रुओं के विनाश की प्रार्थना नहीं है; यह मानव समाज को हिंसा, द्वेष और विनाशकारी मानसिकता से बचाने का वैदिक घोष है। इसमें मनोविज्ञान, समाजशास्त्र, राष्ट्र-सुरक्षा और नैतिक दर्शन का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। ऋषि यह स्पष्ट करते हैं कि पृथ्वी पर शान्ति तभी सम्भव है जब द्वेष का निवारण उसके प्रारम्भिक स्तर पर ही कर दिया जाए।
आज के वैश्विक परिप्रेक्ष्य में, जब युद्ध, वैचारिक कट्टरता, पर्यावरणीय संकट और सामाजिक विभाजन बढ़ रहे हैं, यह मंत्र हमें सिखाता है कि वास्तविक सुरक्षा केवल शक्ति से नहीं, बल्कि दूरदर्शिता, न्याय, नैतिकता और समय रहते किए गए संरक्षण से प्राप्त होती है।
समापन श्लोक
द्वेषो नाशं समायातु, शान्तिर्भूयात् पुनः पुनः।भूमिर्नः पातु सर्वत्र, धर्मो रक्षतु मानवम्॥
(यह समापन श्लोक व्याख्यात्मक रचना है; यह मूल वैदिक मंत्र नहीं है।)
मुकेश ,,,,,,,
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