शब्दयात्री : अधूरे ख़तों का संदूक

 शब्दयात्री : अधूरे ख़तों का संदूक

मेरे पास उसका कोई ख़त नहीं है।

न कोई तस्वीर।

न कोई निशानी।

न कोई ऐसी चीज़ जिसे हाथ में लेकर मैं कह सकूँ—यह उसके होने का सबूत है।

फिर भी अजीब बात है कि मेरे भीतर एक पूरा संदूक रखा है, जो उसी की चीज़ों से भरा हुआ है।

जब मैं उसे खोलता हूँ तो उसमें काग़ज़ नहीं मिलते।

उसमें अधूरे ख़त मिलते हैं।

वे ख़त जो कभी लिखे ही नहीं गए।

वे सवाल जो कभी पूछे नहीं गए।

वे जवाब जो कभी मिले नहीं।

वे विदाइयाँ जो कभी बोली नहीं गईं।

और वे मुलाक़ातें जो शायद हो सकती थीं, लेकिन हुई नहीं।

जीवन का बड़ा हिस्सा जो घटता है, वह नहीं होता जो हमारे साथ घट चुका है।

वह होता है जो घट सकता था और नहीं घटा।

वही सबसे लम्बे समय तक हमारे भीतर रहता है।

मैं कभी-कभी उस संदूक के सामने बैठ जाता हूँ।

उसका ढक्कन खोलता हूँ।

और एक-एक करके वे अधूरे ख़त पढ़ने लगता हूँ।

एक ख़त में मैंने उससे पूछा था कि वह अचानक क्यों चली गई।

उस ख़त का जवाब कभी नहीं आया।

दूसरे ख़त में मैंने उसे बताया था कि उसके जाने के बाद मेरे दिनों का रंग बदल गया है।

वह ख़त भी कभी भेजा नहीं गया।

एक और ख़त था जिसमें कोई शिकायत नहीं थी।

सिर्फ़ यह लिखा था कि कुछ लोगों का चले जाना भी उनकी मौजूदगी की तरह स्थायी हो जाता है।

वह ख़त भी अधूरा रह गया।

शायद इसलिए कि कुछ बातें लिखे जाने के लिए नहीं होतीं।

वे केवल महसूस किए जाने के लिए होती हैं।

समय के साथ मैंने यह भी देखा कि उस संदूक का वज़न बढ़ता जा रहा है।

हालाँकि उसमें कोई नया काग़ज़ नहीं रखा गया।

कोई नया शब्द नहीं जोड़ा गया।

फिर भी वह भारी होता गया।

तब समझ में आया कि स्मृतियाँ वस्तुओं की तरह नहीं होतीं।

वे उम्र के साथ हल्की नहीं होतीं।

वे धीरे-धीरे अपने भीतर अर्थ जमा करती रहती हैं।

जैसे कुएँ में पानी भरता है।

जैसे पेड़ में वलय बनते हैं।

जैसे रात में तारे दिखाई देने लगते हैं।

आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो मुझे उसकी कमी उतनी नहीं महसूस होती जितनी उन बातों की, जो कभी कही नहीं गईं।

क्योंकि जो कहा जाता है, वह एक दिन पूरा हो जाता है।

लेकिन जो अनकहा रह जाता है, वह उम्र भर भीतर बोलता रहता है।

मेरे भीतर भी एक धीमी आवाज़ चलती रहती है।

वह किसी पुकार जैसी नहीं।

किसी फ़रियाद जैसी भी नहीं।

वह वैसी है जैसे किसी पुराने मकान में हवा गुज़रती है और दरवाज़ों को बिना खोले हिला जाती है।

मैं उस आवाज़ को सुनता हूँ और मुस्कुरा देता हूँ।

अब मैं जवाब नहीं चाहता।

न वजह।

न स्पष्टीकरण।

न कोई वापसी।

कुछ यात्राएँ प्रश्नों से शुरू होती हैं और स्वीकृति पर समाप्त होती हैं।

शायद मेरी यात्रा भी अब उसी मुक़ाम पर है।

संदूक अब भी मेरे पास है।

उसमें अधूरे ख़त अब भी रखे हैं।

उनके शब्द पीले पड़ चुके हैं।

उनकी स्याही धुँधली हो चुकी है।

लेकिन जब कभी रात बहुत गहरी होती है और वक़्त का समन्दर बहुत ख़ामोश,

मैं उस संदूक का ढक्कन फिर खोल लेता हूँ।

और उन ख़तों को पढ़ते हुए मुझे महसूस होता है कि प्रेम कभी-कभी वह नहीं होता जो लिखा गया।

प्रेम वह होता है जो अन्त तक लिखा ही नहीं जा सका।

— मुकेश

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