शब्दयात्री — समर्पण

 शब्दयात्री — समर्पण

समर्पण शब्द को मैंने हमेशा ग़लत समझा था। मुझे लगता था कि समर्पण का अर्थ है हार मान लेना, परिस्थितियों के सामने झुक जाना या अपने अधिकार छोड़ देना। शायद इसलिए इस शब्द से एक अनजाना-सा भय भी जुड़ा रहा। मन हमेशा जीतना चाहता था, नियंत्रण अपने हाथ में रखना चाहता था। उसे लगता था कि यदि उसने पकड़ ढीली कर दी, तो सब कुछ बिखर जाएगा।

लेकिन जीवन धीरे-धीरे अपने अर्थ स्वयं खोलता है।

एक दिन महसूस हुआ कि जितनी चीज़ों को मैं अपनी मुट्ठी में क़ैद रखना चाहता था, वे उतनी ही तेज़ी से मुझसे दूर होती चली गईं। रिश्ते, लोग, समय, इच्छाएँ, योजनाएँ—सब अपनी-अपनी दिशा में चलते रहे। मेरी पकड़ केवल मेरी थकान बढ़ाती रही।

तब पहली बार समझ में आया कि समर्पण हार नहीं, विश्वास है।

जिस तरह एक नदी अपने स्रोत से निकलते ही समुद्र का रास्ता पूछना शुरू नहीं करती, उसी तरह जीवन भी हर मोड़ का हिसाब नहीं देता। नदी बहती रहती है। उसे हर पत्थर से लड़ना नहीं पड़ता। वह कभी उसके चारों ओर से निकल जाती है, कभी उसे छूकर आगे बढ़ जाती है। उसका भरोसा अपने बहाव पर होता है।

शायद समर्पण भी ऐसा ही बहाव है।

हम अपने जीवन में बहुत कुछ नियंत्रित करना चाहते हैं। कौन हमारे साथ रहेगा, कौन हमें समझेगा, कौन हमें याद रखेगा, भविष्य कैसा होगा, कल क्या घटेगा—इन सब प्रश्नों का बोझ उठाए-उठाए हम वर्तमान से दूर होते जाते हैं। हम जीने से अधिक जीवन को सँभालने में लगे रहते हैं।

धीरे-धीरे समझ में आता है कि जीवन को सँभालने की आवश्यकता नहीं होती। जीवन स्वयं अपने को सँभालना जानता है।

जिस प्रकार वृक्ष पतझड़ का विरोध नहीं करता, उसी प्रकार जीवन के हर परिवर्तन से लड़ना भी आवश्यक नहीं। वृक्ष जानता है कि पत्तों का गिरना उसकी मृत्यु नहीं है। वह नंगेपन को भी उतनी ही सहजता से स्वीकार करता है, जितनी सहजता से वसंत का स्वागत करता है। शायद इसी स्वीकार में उसकी गरिमा है।

मनुष्य का मन इसके ठीक विपरीत चलता है। वह हर सुख को स्थायी बना लेना चाहता है और हर दुःख को तुरंत समाप्त कर देना चाहता है। इसी खींचतान में वह थक जाता है।

समर्पण का अर्थ यह नहीं कि हम प्रयास करना छोड़ दें। प्रयास तो जीवन का स्वभाव है। किसान बीज बोता है, मिट्टी तैयार करता है, पानी देता है। लेकिन वर्षा उसके अधिकार में नहीं होती। फल आने तक उसे प्रतीक्षा भी करनी पड़ती है और भरोसा भी रखना पड़ता है। यही समर्पण है—जहाँ कर्म पूरे हों, लेकिन परिणाम पर अधिकार का आग्रह न हो।

अब कभी-कभी मैं अपने जीवन को दूर से देखता हूँ। कितनी घटनाएँ ऐसी थीं जिन्हें उस समय मैंने दुर्भाग्य समझा था। बाद में वही किसी नए द्वार का कारण बन गईं। कितने बिछोह ऐसे थे जिनके बिना कुछ अनमोल मिल ही नहीं सकता था। तब लगता है कि जीवन की दृष्टि हमारी दृष्टि से कहीं अधिक व्यापक है।

शायद समर्पण का अर्थ इसी व्यापकता पर भरोसा करना है।

अब जब कोई बात मेरे मन के अनुसार नहीं होती, तो मैं तुरंत उससे लड़ने नहीं लगता। पहले उसे होने देता हूँ। उसे समझने की कोशिश करता हूँ। कई बार जो बात उस क्षण अनुचित लगती है, वही समय के साथ अपना औचित्य स्वयं सिद्ध कर देती है।

धीरे-धीरे यह भी समझ में आने लगा है कि समर्पण किसी व्यक्ति के सामने नहीं, किसी विचार के सामने नहीं, बल्कि जीवन के उस अदृश्य प्रवाह के सामने होता है, जो हमसे कहीं अधिक बुद्धिमान है।

शायद मनुष्य का सबसे बड़ा साहस सब कुछ जीत लेने में नहीं, बल्कि उस क्षण में है जब वह मुस्कुराकर कह सके—

"मैं अपना श्रेष्ठ कर्म करूँगा, लेकिन जीवन को उसके ढंग से घटित होने दूँगा।"

उस दिन भीतर एक अजीब-सी शांति जन्म लेती है।

क्योंकि समर्पण के बाद जीवन बोझ नहीं रहता।

वह एक यात्रा बन जाता है।

और यात्री को फिर हर मोड़ का नक़्शा नहीं चाहिए होता।

उसे केवल इतना विश्वास होता है कि रास्ता, अंततः, उसे वहीं ले जाएगा जहाँ उसे पहुँचना है।

मुकेश ,,,,,,,

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