यस्यां समुद्र उत सिन्धुरापो… — पृथ्वी सूक्त के तृतीय मंत्र की वैज्ञानिक एवं शोधात्मक व्याख्या
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यस्यां समुद्र उत सिन्धुरापो… — पृथ्वी सूक्त के तृतीय मंत्र की वैज्ञानिक एवं शोधात्मक व्याख्या
पृथ्वी सूक्त का तृतीय मंत्र पृथ्वी के उस स्वरूप का चित्रण करता है जिसमें जल, अन्न और प्राणियों का जीवन एक-दूसरे से गहराई से जुड़ा हुआ है। यदि प्रथम मंत्र पृथ्वी के नैतिक आधारों की चर्चा करता है और द्वितीय मंत्र उसकी भौगोलिक एवं औषधीय विविधता का वर्णन करता है, तो यह तृतीय मंत्र पृथ्वी के जलमण्डल (Hydrosphere), अन्नचक्र (Food Cycle) और जीवन-तंत्र (Life System) की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करता है।
वैदिक ऋषि के लिए पृथ्वी केवल मिट्टी का गोला नहीं है; वह जल, अन्न, वनस्पति, पशु और मनुष्य के परस्पर सम्बद्ध जीवन-जाल की धारणकर्ता है। आधुनिक पर्यावरण विज्ञान जिस "इकोसिस्टम" (Ecosystem) की बात करता है, उसका बीजारोपण इस मंत्र में स्पष्ट दिखाई देता है।
मंत्र-पाठ
यस्यां समुद्र उत सिन्धुरापो
यस्यामन्नं कृष्टयः संबभूवुः।
यस्यामिदं जिन्वति प्राणदेयत्
सा नो भूमिः पूर्वपेये दधातु॥(अथर्ववेद 12.1.3)
पदान्वय एवं भावार्थ
जिस पृथ्वी पर समुद्र हैं, नदियाँ और विविध जलराशियाँ विद्यमान हैं; जिस पृथ्वी पर मनुष्यों द्वारा कृषि के माध्यम से अन्न उत्पन्न होता है; जिस पृथ्वी पर यह समस्त प्राणिजगत् जीवित और सक्रिय रहता है—वह भूमि हमें जीवनोपयोगी संसाधन और कल्याण प्रदान करे।
जल : जीवन का प्रथम आधार
मंत्र का आरम्भ ही समुद्र और नदियों के उल्लेख से होता है—
“यस्यां समुद्र उत सिन्धुरापः”
ऋषि जानते हैं कि पृथ्वी पर जीवन का मूल आधार जल है।
आधुनिक विज्ञान भी स्वीकार करता है कि पृथ्वी को अन्य ज्ञात ग्रहों से विशिष्ट बनाने वाला सबसे महत्वपूर्ण तत्व जल है। पृथ्वी की सतह का लगभग 71 प्रतिशत भाग जल से आच्छादित है। समुद्र, नदियाँ, झीलें, हिमनद और भूजल—सभी जीवन-चक्र के अंग हैं।
विशेष रूप से "समुद्र" और "सिन्धु" का पृथक उल्लेख दर्शाता है कि ऋषि विशाल जलराशि (महासागर) और प्रवाहित जलधाराओं (नदियों) के भेद को समझते थे।
जलचक्र (Water Cycle) की वैदिक झलक
यद्यपि इस मंत्र में प्रत्यक्ष रूप से वर्षा का वर्णन नहीं है, किन्तु समुद्र, नदियों और पृथ्वी के एक साथ उल्लेख से जलचक्र की अवधारणा का संकेत मिलता है।
आधुनिक विज्ञान के अनुसार—
- समुद्र से जल वाष्पित होता है,
- बादलों का निर्माण होता है,
- वर्षा होती है,
- नदियाँ बहती हैं,
- और जल पुनः समुद्र में पहुँच जाता है।
यह निरन्तर चक्र पृथ्वी पर जीवन को सम्भव बनाता है।
ऋषि के लिए पृथ्वी जल का भंडार मात्र नहीं, बल्कि जल के समन्वित प्रवाह की आधारभूमि है।
कृषि और अन्न उत्पादन
मंत्र का दूसरा भाग कहता है— “यस्यामन्नं कृष्टयः संबभूवुः”
यहाँ "कृष्टयः" शब्द का अर्थ है—कृषि करने वाले लोग अथवा खेती की प्रक्रिया।
ऋषि स्पष्ट रूप से स्वीकार करते हैं कि अन्न पृथ्वी से उत्पन्न होता है और कृषि मानव जीवन का मूल आधार है।
यह विचार अत्यन्त महत्वपूर्ण है क्योंकि वैदिक संस्कृति मूलतः कृषि-आधारित सभ्यता थी।
आधुनिक कृषि विज्ञान भी बताता है कि अन्न उत्पादन निम्न कारकों पर निर्भर करता है—
- उपजाऊ मिट्टी
- जल उपलब्धता
- जलवायु
- जैविक विविधता
- मानव श्रम
इन सभी का आधार पृथ्वी ही है।
पृथ्वी और खाद्य सुरक्षा
आज सम्पूर्ण विश्व "Food Security" अर्थात् खाद्य सुरक्षा की समस्या से जूझ रहा है।
बढ़ती जनसंख्या, भूमि क्षरण, जल संकट और जलवायु परिवर्तन कृषि को प्रभावित कर रहे हैं।
ऋषि हजारों वर्ष पहले यह समझ चुके थे कि पृथ्वी केवल निवास स्थान नहीं, बल्कि अन्नदाता भी है।
इसलिए वे पृथ्वी को माता के रूप में देखते हैं।
यदि पृथ्वी की उर्वरता नष्ट हो जाए तो सभ्यता का अस्तित्व संकट में पड़ सकता है।
“यस्यामिदं जिन्वति प्राणदेयत्” : जीवन की गतिशीलता
यह मंत्र का अत्यंत गूढ़ भाग है।
"जिन्वति" का अर्थ है—जीवित रखना, गतिशील बनाना, पोषण करना।
"प्राणदेयत्" अर्थात् प्राण धारण करने वाले जीव।
ऋषि का आशय है कि पृथ्वी वह आधार है जिस पर समस्त प्राणिजगत् जीवित रहता है।
यह विचार आधुनिक जीवविज्ञान के उस सिद्धान्त से मेल खाता है कि पृथ्वी एक जटिल जीवन-तंत्र (Living System) है जिसमें—
- सूक्ष्मजीव,
- वनस्पतियाँ,
- पशु,
- पक्षी,
- मनुष्य
सभी परस्पर जुड़े हुए हैं।
पारिस्थितिकी (Ecology) का वैदिक संकेत
आधुनिक पारिस्थितिकी बताती है कि किसी भी जीव का अस्तित्व अकेले सम्भव नहीं है।
हर जीव—
- जल पर निर्भर है,
- भोजन पर निर्भर है,
- पर्यावरण पर निर्भर है।
ऋषि इसी समग्रता को देख रहे हैं।
समुद्र, नदी, अन्न और प्राण—इन चारों को एक ही मंत्र में जोड़कर उन्होंने जीवन की परस्पर निर्भरता का सिद्धान्त प्रस्तुत किया है।
यह आधुनिक Ecosystem Theory की मूल भावना के अत्यन्त निकट है।
“पूर्वपेये” का सांस्कृतिक अर्थ
मंत्र के अन्त में ऋषि प्रार्थना करते हैं—
“सा नो भूमिः पूर्वपेये दधातु”
"पूर्वपेय" का एक अर्थ है—पूर्वजों द्वारा प्राप्त और संरक्षित जीवनोपयोगी संपदा।
यहाँ एक गहरी सांस्कृतिक चेतना दिखाई देती है।
पृथ्वी केवल वर्तमान पीढ़ी की संपत्ति नहीं है।
वह पूर्वजों से प्राप्त धरोहर है जिसे भविष्य की पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुँचाना हमारा दायित्व है।
आज पर्यावरण दर्शन में इसे Intergenerational Responsibility कहा जाता है।
आधुनिक पर्यावरणीय सन्दर्भ
यदि इस मंत्र को इक्कीसवीं शताब्दी के परिप्रेक्ष्य में पढ़ें तो यह कई महत्वपूर्ण संदेश देता है—
- जलस्रोतों का संरक्षण
- नदियों की स्वच्छता
- कृषि भूमि की रक्षा
- जैव-विविधता का संरक्षण
- सतत कृषि (Sustainable Agriculture)
- खाद्य सुरक्षा
ऋषि का संदेश स्पष्ट है कि पृथ्वी, जल और अन्न का संतुलन ही जीवन का आधार है।
पृथ्वी सूक्त का तृतीय मंत्र पृथ्वी को जल, अन्न और प्राण के समन्वित आधार के रूप में प्रस्तुत करता है। समुद्रों और नदियों का उल्लेख पृथ्वी के जलमण्डल की ओर संकेत करता है, कृषि का वर्णन खाद्य उत्पादन के महत्व को रेखांकित करता है, और प्राणियों के जीवन का उल्लेख पृथ्वी को सम्पूर्ण जैविक जगत् की जननी के रूप में स्थापित करता है।
वैज्ञानिक दृष्टि से यह मंत्र जलचक्र, कृषि-विज्ञान, पारिस्थितिकी तथा सतत विकास की मूल अवधारणाओं का अत्यन्त प्राचीन दार्शनिक रूप है। ऋषि हमें स्मरण कराते हैं कि पृथ्वी, जल और अन्न के प्रति सम्मान केवल धार्मिक कर्तव्य नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व की अनिवार्य शर्त है।
समापन श्लोक
समुद्रसिन्धुसंपन्ना धान्यधाराप्रवर्धिनी।
प्राणिनां जीवनाधारा भूर्माता पातु सर्वदा॥
(यह व्याख्यात्मक रचना है, मूल वैदिक मंत्र नहीं।)
मुकेश ,,,,,,,
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