नदी का अकेलापन
नदी का अकेलापन
नदी
हमेशा चलती हुई लगती है
पर असल में
वह सबसे अकेली होती है।
वह हर चीज़ को छूती है
पर किसी को रोक नहीं पाती।
प्रेम भी
इसी तरह का बहाव है।
वह सबको महसूस करता है
पर किसी को पकड़ नहीं पाता।
और जो पकड़ लेता है
वह बहाव नहीं रहता
सिर्फ़ ठहराव बन जाता है।
इसलिए प्रेम
हमेशा चलते रहने में ही
अपनी पूरी सच्चाई पाता है।
— Mukesh
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